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तस्मिन्सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः॥४९॥

In Hindi:

पदपाठ : तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोः गतिविच्छेदः प्राणायामः॥

हिंदी में अर्थ : (तस्मिन् सति) उस आसन के दृढ़ हो जाने पर (श्वासप्रश्वासयोः) श्वास = वायु को भीतर लेने और प्रश्वास = वायु को बाहर छोड़ने की (गतिविच्छेदः) गति = स्वाभाविक गति को यथा सामर्थ्य रोक देना (प्राणायामः) प्राणायाम है॥

महर्षि दयानन्द व्याख्या : ऋषिकृत अर्थ में व्यासभाष्य से अतिरिक्त निम्न शब्द हैं — “आसने सम्यक्सिद्धे कृते बाह्याभ्यन्तरगमन- शीलस्य वायोर्युक्त्या शनैः शनैरभ्यासेन जयकरणमर्थात् स्थिरीकृत्य गत्याभावकरणं प्राणायामः।” (ऋ० भू॰ उपासना॰)

अर्थात् आसन के सम्यक् रूप से सिद्ध हो जाने के पश्चात् बाहर और भीतर आने-जाने के स्वभाव वाले वायु को युक्तिपूर्वक धीरे-धीरे अभ्यास से जय करना चाहिए अर्थात् वायु की गति का अभाव करना प्राणायाम है। (लेखक)

(तस्मिन् सति॰) जो वायु बाहर से भीतर को आता है, उसको श्वास और जो भीतर से बाहर जाता है, उसको प्रश्वास कहते हैं। उन दोनों के जाने आने को विचार से रोके, नासिका को हाथ से कभी न पकड़े किन्तु ज्ञान से ही उनके रोकने को प्राणायाम कहते हैं। (ऋ० भू॰ उपासना॰)

प्राचीन ॠषि भाष्य : सत्यासनजये ब्राह्यस्य वायोराचमनं श्वासः। कौष्ठ्यस्य वायोर्निःसारणं प्रश्वासः। तयोर्गतिविच्छेद उभयाभावः प्राणायामः॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (सति आसनजये) आसन के सिद्ध हो जाने पर (ब्राह्यस्य वायोः) बाहर के वायु का (आचमनम्) आचमन = नासिका पुट से भीतर ग्रहण करना (श्वासः) श्वास है; और (कौष्ठ्यस्य) कौष्ठ = उदर के (वायोः) वायु को (निःसारणम्) नासिका पुट से बाहर निकालना (प्रश्वासः) प्रश्वास है। (तयोः) उन दोनों = श्वास और प्रश्वास की (गतिविच्छेदः) स्वाभाविक गति का विच्छेद = यथा सामर्थ्य रोकना अर्थात् (उभयाभावः) श्वास और प्रश्वास का अभाव होना (प्राणायामः) प्राणायाम कहा जाता है॥

वैदिक वृत्ति : आसन की सुखपूर्वक स्थिरता हो जाने पर साधक के लिए प्राणायाम का निर्देश किया गया है। इसका अभिप्राय यह है कि साधक को प्राणायाम का अभ्यास आसन विशेष में बैठ कर करना चाहिए। चलते-फिरते अथवा अस्थिर आसन के होने पर किया गया प्राणायाम चित्तवृत्ति निरोध हेतु सहायक नहीं होता। इसमें रहस्य यह है कि जिस प्रकार आसन की स्थिरता चित्तवृत्ति निरोध हेतु आवश्यक है उसी प्रकार स्थिर आसन के साथ-साथ प्राणायाम से ही धारणा हेतु साधक के मन की योग्यता बनती है। अर्थात् जब तक बाह्य-शरीर सम्बन्धी प्रयत्न = चेष्टाओं का निरोध नहीं होता, तब तक कैसे प्राणायाम द्वारा मन की आन्तरिक धारणा सम्बन्धी योग्यता उत्पन्न हो सकती है? अतः महर्षि पतञ्जलि ने प्राणायाम की सफलता से पूर्व आसन सिद्धि की अनिवार्यता को कहा है।

बाहर के वायु को नासिका द्वारा भीतर लेना “श्वास” और कौष्ठ में स्थित वायु को नासिका द्वारा बाहर निकालना “प्रश्वास” कहलाता है। इन दोनों की स्वाभाविक गति का निरोध करना = रोक देना प्राणायाम कहलाता है। महर्षि दयानन्द इस विषय में कहते हैं कि “उन दोनों के जाने आने को विचार से रोके, नासिका को हाथ से कभी न पकड़े किन्तु ज्ञान से ही उनके रोकने को प्राणायाम कहते हैं।” इससे स्पष्ट है कि स्थिर आसन के पश्चात् प्राणायाम हेतु हाथ द्वारा बाह्य प्रयत्न अर्थात् नासिका को पकड़ना आदि नहीं होना चाहिए। इन श्वास और प्रश्वास को ज्ञान द्वारा रोकना चाहिए, और इस प्रकार ज्ञान से श्वास-प्रश्वास को रोकने का अभ्यास ही आगे चल कर सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि में सहायक होता है। अन्यथा हाथ द्वारा नासिका पकड़ने से चित्तवृत्ति के बहिर्मुखी हो जाने से, साधक सम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति में ही असमर्थ रहेगा; असम्प्रज्ञात समाधि तक पहुँचना तो दूर का विषय होगा।