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ईश्वर प्रार्थना विषयः

In Hindi:

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : ईश्वर प्रार्थना विषयः

महर्षि दयानन्द व्याख्या :

ओ३म् सह नाववतु सह नौ भुनक्तु।सह वीर्यं करवावहै।



तेजस्विनावधीतमस्तु।मा विद्विषावहै॥1॥



ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥



—तैत्तिरीय-आरण्यके। नवमप्रपाठके। प्रथमानुवाके॥



ब्रह्मानन्तमनादिविश्वकृदजं सत्यं परं शाश्वतं,विद्या यस्य सनातनी निगमभृद् वैधर्म्यविध्वंसिनी।

वेदाख्या विमला हिता हि जगते नृभ्यः सुभाग्यप्रदा,तन्नत्वा निगमार्थभाष्यमतिना भाष्यं तु तन्तन्यते॥1॥

कालरामाङ्कचन्द्रेऽब्दे भाद्रमासे सिते दले। प्रतिपद्यादित्यवारे भाष्यारम्भः कृतो मया॥2॥

दयाया आनन्दो विलसति परः स्वात्मविदितः,सरस्वत्यस्याग्रे निवसति हिता हीशशरणा।

इयं ख्यातिर्यस्य प्रततसुगुणा वेदमननाऽस्त्यनेनेदं भाष्यं रचितमिति बोद्धव्यमनघाः॥3॥

मनुष्येभ्यो हितायैव सत्यार्थं सत्यमानतः। ईश्वरानुग्रहेणेदं वेदभाष्यं विधीयते॥4॥

संस्कृतप्राकृताभ्यां यद् भाषाभ्यामन्वितं शुभम्। मन्त्रार्थवर्णनं चात्र क्रियते कामधुङ् मया॥5॥

आर्य्याणां मुन्यृषीणां या व्याख्यारीतिः सनातनी। तां समाश्रित्य मन्त्रार्था विधास्यन्ते तु नान्यथा॥6॥

येनाधुनिकभाष्यैर्ये टीकाभिर्वेददूषकाः। दोषाः सर्वे विनश्येयुरन्यथार्थविवर्णनाः॥7॥

सत्यार्थश्च प्रकाश्येत वेदानां यः सनातनः। ईश्वरस्य सहायेन प्रयत्नोऽयं सुसिध्यताम्॥8॥



भाषार्थ—(सह नाव॰) हे सर्वशक्तिमन् ईश्वर! आपकी कृपा, रक्षा और सहाय से हम लोग परस्पर एक दूसरे की रक्षा करें। (सह नौ भुनक्तु॰) और हम सब लोग परमप्रीति से मिल के सब से उत्तम ऐश्वर्य अर्थात् चक्रवर्तिराज्य आदि सामग्री से आनन्द को आप के अनुग्रह से सदा भोगें। (सह वीर्यं॰) हे कृपानिधे! आपके सहाय से हम लोग एक दूसरे के सामर्थ्य को पुरुषार्थ से सदा बढ़ाते रहें। (तेजस्वि॰) और हे प्रकाशमय सब विद्या के देने वाले परमेश्वर! आपके सामर्थ्य से ही हम लोगों का पढ़ा और पढ़ाया सब संसार में प्रकाश को प्राप्त हो और हमारी विद्या सदा बढ़ती रहे, (मा विद्विषा॰) हे प्रीति के उत्पादक! आप ऐसी कृपा कीजिये कि जिससे हम लोग परस्पर विरोध कभी न करें किन्तु एक दूसरे के मित्र होके सदा वर्तें।



(ओं शान्तिः॰) हे भगवन्! आप की करुणा से हम लोगों के तीन ताप—एक ‘आध्यात्मिक’ जो कि ज्वरादि रोगों से शरीर में पीड़ा होती है, दूसरा ‘आधिभौतिक’ जो दूसरे प्राणियों से होता है और तीसरा ‘आधिदैविक’ जो कि मन और इन्द्रियों के विकार, अशुद्धि और चञ्चलता से क्लेश होता है, इन तीनों तापों को आप शान्त अर्थात् निवारण कर दीजिये, जिस से हम लोग सुख से इस वेदभाष्य को यथावत् बना के सब मनुष्यों का उपकार करें। यही आप से चाहते हैं सो कृपा करके हम लोगों को सब दिनों के लिये सहाय कीजिये॥1॥





(ब्रह्मानन्त॰) जो ब्रह्म अनन्त आदि विशेषणों से युक्त है, जिसकी वेद विद्या सनातन है, उस को अत्यन्त प्रेम भक्ति से मैं नमस्कार करके इस वेदभाष्य के बनाने का आरम्भ करता हूं॥1॥



(कालरा॰) विक्रम के संवत् 1933 भाद्रमास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, रविवार के दिन इस वेदभाष्य का आरम्भ मैंने किया है॥2॥



(दयाया॰) सब सज्जन लोगों को यह बात विदित हो कि जिन का नाम स्वामी दयानन्द सरस्वती है उन्होंने इस वेदभाष्य को रचा है॥3॥



(मनुष्ये॰) ईश्वर की कृपा के सहाय से सब मनुष्यों के हित के लिए इस वेदभाष्य का विधान मैं करता हूं॥4॥



(संस्कृतप्रा॰) सो यह वेदभाष्य दो भाषाओं में किया जाता है—एक संस्कृत और दूसरी प्राकृत। इन दोनों भाषाओं में वेदमन्त्रों के अर्थ का वर्णन मैं करता (आर्य्याणां॰) इस वेदभाष्य में अप्रमाण लेख कुछ भी नहीं किया जाता है, किन्तु जो ब्रह्मा से लेके व्यास पर्यन्त मुनि और ऋषि हुए हैं उन की जो व्याख्यारीति है उस से युक्त ही यह वेदभाष्य बनाया जायगा॥6॥



(येनाधु॰) यह भाष्य ऐसा होगा कि जिस से वेदार्थ से विरुद्ध अब के बने भाष्य और टीकाओं से वेदों में भ्रम से जो मिथ्या दोषों के आरोप हुए हैं वे सब निवृत्त हो जायेंगे॥7॥



(सत्यार्थश्च॰) और इस वेदभाष्य से वेदों का जो सत्य अर्थ है सो संसार में प्रसिद्ध हो, कि वेदों के सनातन अर्थ को सब लोग यथावत् जान लें, इसलिए यह प्रयत्न मैं करता हूं, सो परमेश्वर के सहाय से यह काम अच्छे प्रकार सिद्ध हो, यही सर्वशक्तिमान् परमेश्वर से मेरी प्रार्थना है॥8॥



[ईश्वरप्रार्थनाविषयः]



विश्वानि देव सवितर्दुरितानिपरासुव। यद्भद्रं तन्न आ सुव॥1॥ —यजुर्वेद। अध्याये 30। मन्त्रः 3॥



भाष्यम्—हे सच्चिदानन्तस्वरूप! हे परमकारुणिक! हे अनन्तविद्य! हे विद्या- विज्ञानप्रद! (देव! हे सूर्यादि-सर्वजगद्विद्या-प्रकाशक! हे सर्वानन्दप्रद! (सवितः) हे सकलजगदुत्पादक ! (नः) अस्माकम् (विश्वानि) सर्वाणि (दुरितानि) दुःखानि सर्वान् दुष्टगुणांश्च (परासुव) दूरे गमय। (यद्भद्रं) यत्कल्याणं सर्वदुःखरहितं सत्यविद्या-प्राप्त्याऽभ्युदय-निःश्रेयस-सुखकरं भद्रमस्ति (तन्नः) अस्मभ्यं (आसुव) आ समन्तादुत्पादय कृपया प्रापय।



अस्मिन् वेदभाष्य-करणानुष्ठाने ये दुष्टा विघ्नास्तान् प्राप्तेः पूर्वमेव परासुव दूरं गमय,यच्च शरीर-बुद्धि-सहाय-कौशल-सत्यविद्या-प्रकाशादिभद्रमस्ति तत्स्वकृपा-कटाक्षेण हे परब्रह्मन्! नोऽस्मभ्यं प्रापय,भवत्कृपाकटाक्ष-सुसहायप्राप्त्या सत्यविद्योज्ज्वलं प्रत्यक्षादिप्रमाणसिद्धं भवद्रचितानां वेदानां यथार्थं भाष्यं वयं विदधीमहि। तदिदं सर्वमनुष्योपकाराय भवत्कृपया भवेत्। अस्मिन् वेदभाष्ये सर्वेषां मनुष्याणां परमश्रद्धयाऽत्यन्ता प्रीतिर्यथा स्यात् तथैव भवता कार्यमित्यो३म्॥



भाषार्थ—हे सत्यस्वरूप ! हे विज्ञानमय! हे सदानन्दस्वरूप ! हे अनन्तसामर्थ्ययुक्त! हे परमकृपालो! हे अनन्तविद्यामय! हे विज्ञानविद्याप्रद! (देव) हे परमेश्वर! आप सूर्यादि सब जगत्





का और विद्या का प्रकाश करने वाले हैं तथा सब आनन्द को देने वाले हैं, (सवितः) हे सर्वजगदुत्पादक सर्वशक्तिमन्! आप सब जगत् को उत्पन्न करने वाले हो, (नः) हमारे (विश्वानि) सब जो (दुरितानि) दुःख हैं उनको और हमारे सब दुष्ट गुणों को कृपा से आप (परासुव) दूर कर दीजिये, अर्थात् हम से उन को और हम को उन से सदा दूर रखिये, (यद्भद्रं) और जो सब दुःखों से रहित कल्याण है, जो कि सब सुखों से युक्त भोग है, उस को हमारे लिये सब दिनों में प्राप्त कीजिये। सो सुख दो प्रकार का है—एक जो सत्य विद्या की प्राप्ति से अभ्युदय अर्थात् चक्रवर्ति राज्य, इष्ट मित्र, धन, पुत्र, स्त्री और शरीर से अत्यन्त उत्तम सुख का होना, और दूसरा जो कि निःश्रेयस सुख है कि जिस को मोक्ष कहते हैं और जिस में ये दोनों सुख हैं उसी को भद्र कहते हैं (तन्न आ सुव) उस सुख को आप हमारे लिये सब प्रकार से प्राप्त करिये।



और आपकी कृपा के सहाय से सब विघ्न हम से दूर रहें कि जिससे इस वेदभाष्य के करने का हमारा अनुष्ठान सुख से पूरा होय। इस अनुष्ठान में हमारे शरीर में आरोग्य, बुद्धि, सज्जनों का सहाय, चतुरता और सत्यविद्या का प्रकाश सदा बढ़ता रहे। इस भद्रस्वरूप सुख को आप अपनी सामर्थ्य से ही हम को दीजिए, जिस कृपा के सामर्थ्य से हम लोग सत्य विद्या से युक्त जो आपके बनाये वेद हैं उनके यथार्थ अर्थ से युक्त भाष्य को सुख से विधान करें। सो यह वेदभाष्य आपकी कृपा से सम्पूर्ण हो के सब मनुष्यों का सदा उपकार करने वाला हो और, आप अन्तर्यामी की प्रेरणा से सब मनुष्यों का इस वेदभाष्य में श्रद्धा सहित अत्यन्त उत्साह हो, जिससे वेदभाष्य करने में जो हम लोगों का प्रयत्न है सो यथावत् सिद्धि को प्राप्त हो। इसी प्रकार से आप हमारे और सब जगत् के ऊपर कृपादृष्टि करते रहें, जिससे इस बड़े सत्य काम को हम लोग सहज से सिद्ध करें॥1॥



यो भूतं च भव्यं च सर्वं यश्चाधितिष्ठति। स्वर्यस्य च केवलं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः॥1॥



यस्य भूमिः प्रमान्तरिक्षमुतोदरम्। दिवं यश्चक्रे मूर्द्धानं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः॥2॥



यस्य सूर्यश्चक्षुश्चन्द्रमाश्च पुनर्णवः। अग्निं यश्चक्र आस्यं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः॥3॥



यस्य वातः प्राणापानौ चक्षुरङ्गिरसोऽभवन्। दिशो यश्चक्रे प्रज्ञानीस्तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः॥4॥



—अथर्ववेदसंहितायाम्। काण्डे 10। प्रपाठके 23। अनुवाके 4। मं॰ 1।32।33।34॥



भाष्यम्—(यो भूतं च॰) यो भूतभविष्यद्वर्तमानान् कालान् (सर्वं यश्चाधि॰) सर्वं जगच्चाधितिष्ठति,सर्वाधिष्ठाता सन् कालादूर्ध्वं विराजमानोऽस्ति। (स्वर्य॰) यस्य च केवलं निर्विकारं स्वः सुखस्वरूपमस्ति,यस्मिन् दुःखं लेशमात्रमपि नास्ति,यदानन्दघनं ब्रह्मास्ति, (तस्मै ज्ये॰) तस्मै ज्येष्ठाय सर्वोत्कृष्टाय ब्रह्मणे महतेऽत्यन्तं नमोऽस्तु नः॥1॥



(यस्य भू॰) यस्य भूमिः प्रमा यथार्थज्ञानसाधनं पादाविवास्ति, (अन्तरिक्षमु॰) अन्तरिक्षं यस्योदरतुल्यमस्ति,यश्च सर्वस्मादूर्ध्वं सूर्यरश्मि-प्रकाशमयमाकाशं दिवं मूर्धानं शिरोवच्चक्रे कृतवानस्ति,तस्मै॰॥2॥



(यस्य सू॰) यस्य सूर्यश्चन्द्रमाश्च पुनः पुनः सर्गादौ नवीने चक्षुषी इव भवतः,योऽग्निमास्यं मुखवच्चक्रे कृतवानस्ति,तस्मै॰॥3॥





(यस्य वातः॰) वातः समष्टिर्वायुर्यस्य प्राणापानाविवास्ति, (अङ्गिरसः)‘अङ्गिरा अङ्गारा अङ्कना अञ्चना इति’निरुक्ते अ॰3। खं॰17॥ प्रकाशिकाः किरणाश्चक्षुषी इव भवतः। यो दिशः प्रज्ञानीः प्रज्ञापिनीर्व्यव्यहार-साधिकाश्चक्रे,तस्मै ह्यनन्तविद्याय ब्रह्मणे महते सततं नमोऽस्तु॥4॥



भाषार्थ—(यो भूतं च॰) जो परमेश्वर एक भूतकाल जो व्यतीत हो गया है, (च) अनेक चकारों से दूसरा जो वर्तमान है, (भव्यं च) और तीसरा भविष्यत् जो होने वाला है, इन तीनों कालों के बीच में जो कुछ होता है उन सब व्यवहारों को वह यथावत् जानता है, (सर्वं यश्चाधितिष्ठति) तथा जो सब जगत् को अपने विज्ञान से ही जानता, रचता, पालन, लय करता और संसार के सब पदार्थों का अधिष्ठाता अर्थात् स्वामी है। (स्वर्यस्य च केवलं) जिस का सुख ही केवल स्वरूप है, जो कि मोक्ष और व्यवहार सुख का भी देने वाला है, (तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः) ज्येष्ठ अर्थात् सब से बड़ा सब सामर्थ्य से युक्त ब्रह्म जो परमात्मा है उसको अत्यन्त प्रेम से हमारा नमस्कार हो। जो कि सब कालों के ऊपर विराजमान है, जिसको लेशमात्र भी दुःख नहीं होता उस आनन्दघन परमेश्वर को हमारा नमस्कार प्राप्त हो॥1॥



(यस्य भूमिः प्रमा॰) जिस परमेश्वर के होने और ज्ञान में भूमि जो पृथिवी आदि पदार्थ हैं सो प्रमा अर्थात् यथार्थज्ञान की सिद्धि होने का दृष्टान्त है तथा जिस ने अपनी सृष्टि में पृथिवी को पादस्थानी रचा है, (अन्तरिक्षमुतोदरम्) अन्तरिक्ष जो पृथिवी और सूर्य के बीच में आकाश है सो जिसने उदरस्थानी किया है, (दिवं यश्चक्रे मूर्धानम्) और जिसने अपनी सृष्टि में दिव अर्थात् प्रकाश करने वाले पदार्थों को सब के ऊपर मस्तकस्थानी किया है, अर्थात् जो पृथिवी से लेके सूर्यलोकपर्यन्त सब जगत् को रच के उस में व्यापक होके, जगत् के सब अवयवों में पूर्ण होके सब को धारण कर रहा है, (तस्मै) उस परब्रह्म को हमारा अत्यन्त नमस्कार हो॥2॥



(यस्य सूर्यश्चक्षुश्चन्द्र॰) और जिसने नेत्रस्थानी सूर्य और चन्द्रमा को किया है, जो कल्प कल्प के आदि में सूर्य और चन्द्रमादि पदार्थों को वारंवार नये नये रचता है, (अग्निं यश्चक्र आस्यम्) और जिसने मुखस्थानी अग्नि को उत्पन्न किया है, (तस्मै॰) उसी ब्रह्म को हम लोगों का नमस्कार हो॥3॥



(यस्य वातः प्राणापानौ) जिसने ब्रह्माण्ड के वायु को प्राण और अपान की नाईं किया है, (चक्षुरङ्गिरसोऽभवन्) तथा जो प्रकाश करने वाली किरण हैं वे चक्षु की नाईं जिसने की हैं, अर्थात् उन से ही रूप ग्रहण होता है।



(दिशो यश्चक्रे प्रज्ञानीस्त॰) और जिसने दश दिशाओं को सब व्यवहारों को सिद्ध करने वाली बनाईं हैं, ऐसा जो अनन्तविद्यायुक्त परमात्मा सब मनुष्यों का इष्टदेव है, उस ब्रह्म को निरन्तर हमारा नमस्कार हो॥4॥



य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः।



यस्य च्छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥5॥ —यजु॰ अ॰ 25॥ मं॰ 13॥



द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥6॥





यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु।



शन्नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः॥7॥ —यजुः अ॰ 36। मं॰ 17,22॥



यस्मिन्नृचः साम यजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः।



यस्मिँश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मेमनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥8॥ —यजुः अ॰ 34। मं॰ 5॥



भाष्यम्—(य आत्मदाः) य आत्मदा विद्याविज्ञानप्रदः, (बलदाः) यः शरीरेन्द्रिय-प्राणात्ममनसां पुष्ट्युत्साह-पराक्रम-दृढत्वप्रदः, (यस्य॰) यं विश्वेदेवाः सर्वे विद्वांस उपासते यस्यानुशासनं च मन्यन्ते, (यस्य च्छाया॰) यस्याश्रय एव मोक्षोऽस्ति,यस्यच्छायाऽकृपाऽनाश्रयो मृत्युर्जन्म-मरण-कारकोऽस्ति, (कस्मै॰) तस्मै कस्मै प्रजापतये‘प्रजापतिर्वै कस्तस्मै हविषा विधेमेति’। शतपथब्राह्मणे। काण्डे7अ॰3॥ सुखस्वरूपाय ब्रह्मणे देवाय प्रेमभक्तिरूपेण हविषा वयं विधेम,सततं तस्यैवोपासनं कुर्वीमहि॥5॥



(द्यौः शान्तिः॰) हे सर्वशक्तिमन् परमेश्वर ! त्वद्भक्त्या त्वत्कृपया च द्यौरन्तरिक्षं,पृथिवी जलमोषधयो वनस्पतयो विश्वे देवाः सर्वे विद्वांसो ब्रह्म वेदः,सर्वं जगच्चास्मदर्थं शान्तं निरुपद्रवं सुखकारकं सर्वदाऽस्तु। अनुकूलं भवतु नः। येन वयं वेदभाष्यं सुखेन विदधीमहि। हे भगवन्नेतया सर्वशान्त्या विद्या-बुद्धि-विज्ञानारोग्य-सर्वोत्तम-सहायैर्भवान् मां सर्वथा वर्धयतु तथा सर्वं जगच्च॥6॥



(यतो यतः॰) हे परमेश्वर ! यतो यतो देशात्त्वं समीहसे जगद्रचन-पालनार्थां चेष्टां करोषि,ततस्ततो देशान्नोऽस्मानभयं कुरु,यतः सर्वथा सर्वेभ्यो देशेभ्यो भयरहिता भवत्कृपया वयं भवेम। (शन्नः कुरु॰) तथा तत्रस्थाभ्यः प्रजाभ्यः पशुभ्यश्च नोऽस्मानभयं कुरु। एवं सर्वेभ्यो देशेभ्यस्तत्रस्थाभ्यः प्रजाभ्यः पशुभ्यश्च नोऽस्मान् शं कुरु,धर्मार्थ-काम-मोक्षादि-सुखयुक्तान् स्वानुग्रहेण सद्यः सम्पादय॥7॥



(यस्मिन्नृचः॰) हे भगवन् कृपानिधे! यस्मिन् मनसि ऋचः सामानि यजूंषि च प्रतिष्ठितानि भवन्ति,यस्मिन् यथार्थ-मोक्ष-विद्या च प्रतिष्ठिता भवति,कस्यां क इव?रथनाभौ अरा इव। (यस्मिँश्च॰) यस्मिंश्च प्रजानां चित्तं स्मरणात्मकं सर्वमोतमस्ति सूत्रे मणिगणवत्प्रोतमस्ति। तन्मे मम मनो भवत्कृपया शिवसङ्कल्पं कल्याणप्रियं सत्यार्थप्रकाशं चास्तु,येन वेदानां सत्यार्थः प्रकाश्येत। हे सर्वविद्यामय सर्वार्थविन् ! मदुपरि कृपां विधेहि,यथा निर्विघ्नेन वेदार्थभाष्यं सत्यार्थं पूर्णं वयं कुर्वीमहि,भवद्यशो वेदानां सत्यार्थं विस्तारयेमहि। यं दृष्ट्वा वयं सर्वे सर्वोत्कृष्टगुणा भवेम। ईदृशीं करुणामस्माकमुपरि करोतु भवान्। एतदर्थं प्रार्थ्यते। अनया प्रार्थनयाऽस्मान् शीघ्रमेवानुगृह्णातु। यत इदं सर्वोपकारकं कृत्यं सिद्धं भवेत्॥8॥



भाषार्थ—(य आत्मदाः॰) जो जगदीश्वर अपनी कृपा से ही अपने आत्मा का विज्ञान देने वाला है, जो सब विद्या और सत्य सुखों की प्राप्ति कराने वाला है, जिसकी उपासना सब विद्वान् लोग करते आये हैं, और जिस का अनुशासन जो वेदोक्त शिक्षा है उसको अत्यन्त मान्य से सब शिष्ट लोग स्वीकार करते हैं, जिस का आश्रय करना ही मोक्षसुख का कारण है और जिस की





अकृपा ही जन्ममरणरूप दुःखों को देने वाली है, अर्थात् ईश्वर और उस का उपदेश जो सत्यविद्या सत्यधर्म और सत्यमोक्ष हैं उन को नहीं मानना, और जो वेद से विरुद्ध होके अपनी कपोलकल्पना अर्थात् दुष्ट इच्छा से बुरे कामों में वर्त्तता है, उस पर ईश्वर की अकृपा होती है, वही सब दुःखों का कारण है, और जिसकी आज्ञापालन ही सब सुखों का मूल है, (कस्मै॰) जो सुखस्वरूप और सब प्रजा का पति है उस परमेश्वर देव की प्राप्ति के लिए सत्य प्रेम भक्तिरूप सामग्री से हम लोग नित्य भजन करें, जिससे हम लोगों को किसी प्रकार का दुःख कभी न हो॥5॥



(द्यौः शान्ति॰) हे सर्वशक्तिमन् भगवन्! आप की भक्ति और कृपा से ही ‘द्यौः’ जो सूर्यादि लोकों का प्रकाश और विज्ञान है यह सब दिन हम को सुखदायक हो तथा आकाश में पृथिवी जल ओषधि वनस्पति वट आदि वृक्ष, जो संसार के सब विद्वान्, ब्रह्म जो वेद, ये सब पदार्थ और इनसे भिन्न भी जो जगत् है वे सब सुख देने वाले हम को सब काल में हों कि सब पदार्थ सब दिन हमारे अनुकूल रहें, जिस से इस वेद-भाष्य के काम को सुखपूर्वक हम लोग सिद्ध करें। हे भगवन्! इस सब शान्ति से हम को विद्या बुद्धि विज्ञान आरोग्य और सब उत्तम सहाय को कृपा से दीजिये तथा हम लोगों और सब जगत् को उत्तम गुण और सुख के दान से बढ़ाइये॥6॥



(यतो यतः॰) हे परमेश्वर! आप जिस-जिस देश से जगत् के रचन और पालन के अर्थ चेष्टा करते हैं उस उस देश से भय से रहित करिये, अर्थात् किसी देश से हम को किञ्चित् भी भय न हो, (शन्नः कुरु) वैसे ही सब दिशाओं में जो आप की प्रजा और पशु हैं उन से भी हम को भयरहित करें तथा हम से उनको सुख हो, और उनको भी हम से भय न हो तथा आप की प्रजा में जो मनुष्य और पशु आदि हैं, उन सब से जो धर्म, अर्थ काम और मोक्ष पदार्थ हैं उन को आप के अनुग्रह से हम लोग शीघ्र प्राप्त हों, जिस से मनुष्यजन्म के धर्मादि जो फल हैं, वे सुख से सिद्ध हों॥7॥



(यस्मिन्नृचः) हे भगवन् कृपानिधे! (ऋचः) ऋग्वेद (साम) सामवेद (यजूँषि) यजुर्वेद और इन तीनों के अन्तर्गत होने से अथर्ववेद भी, ये सब जिस में स्थित होते हैं तथा जिस में मोक्षविद्या अर्थात् ब्रह्मविद्या और सत्यासत्य का प्रकाश होता है, (यस्मिँश्चित्तं॰) जिस में सब प्रजा का चित्त जो स्मरण करने की वृत्ति है सो सब गंठी हुई है, जैसे माला के मणिये सूत्र में गंठे हुए होते हैं, और जैसे रथ के पहिए के बीच भाग में अरे लगे होते हैं, कि उस काष्ठ में जैसे अन्य काष्ठ लगे रहते हैं, ऐसा जो मेरा मन है, सो आप की कृपा से शुद्ध हो तथा कल्याण जो मोक्ष और सत्य धर्म का अनुष्ठान तथा असत्य के परित्याग करने का सङ्कल्प जो इच्छा है, इससे युक्त सदा हो। जिस मन से हम लोगों को आप के किये वेदों के सत्य अर्थ का यथावत् प्रकाश हो।



हे सर्वविद्यामय सर्वार्थवित् जगदीश्वर! हम पर आप कृपा धारण करें जिस से हम लोग विघ्नों से सदा अलग रहें, और सत्य अर्थ सहित वेदभाष्य को सम्पूर्ण बना के आप के बनाये वेदों के सत्य अर्थ की विस्ताररूप जो कीर्ति है उस को जगत् में सदा के लिए बढ़ावें, और इस भाष्य को देख के वेदों के अनुसार सत्य का अनुष्ठान करके हम सब लोग श्रेष्ठ गुणों से युक्त सदा हों। इसलिए हम लोग आपकी प्रार्थना प्रेम से सदा करते हैं। इस को आप कृपा से शीघ्र सुनें। जिस से यह जो सब का उपकार करने वाला वेदभाष्य का अनुष्ठान है सो यथावत् सिद्धि को प्राप्त हो॥



॥इतीश्वरप्रार्थनाविषयः॥1॥