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वेदोक्तधर्मविषयः

In Hindi:

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : वेदोक्तधर्मविषयः

महर्षि दयानन्द व्याख्या :

सङ्गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम् ।



देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते ॥1॥



-ऋ॰ अ॰ 8। अ॰ 8। व॰ 49। मं॰ 2॥



भाष्यम्-(सं गच्छध्वं॰) ईश्वरोऽभिवदति-हे मनुष्या! मयोक्तं न्याय्यं पक्षपातरहितं सत्यलक्षणोज्ज्वलं धर्मं यूयं सं गच्छध्वं सम्यक् प्राप्नुत अर्थात् तत्प्राप्त्यर्थं सर्वं विरोधं विहाय परस्परं सङ्गता भवत येन युष्माकमुत्तमं सुखं सर्वदा वर्धेत सर्वदुःखनाशश्च भवेत् (सं वद॰) सङ्गता भूत्वा परस्परं जल्पवितण्डादि-विरुद्धवादं विहाय सम्प्रीत्या प्रश्नोत्तर-विधानेन संवादं कुरुत,यतो युष्मासु सम्यक् सत्यविद्याद्युत्तमगुणाः सदा वर्धेरन् (सं वो मनांसि जानताम्) यूयं जानन्तो विज्ञानवन्तो भवत,जानतां वो युष्माकं मनांसि यथा ज्ञानवन्ति भवेयुस्तथा सम्यक् पुरुषार्थं कुरुत,अर्थाद्येन युष्मन्मनांसि सदानन्दयुक्तानि स्युस्तथा प्रयतध्वम्। युष्माभिर्धर्म एव सेवनीयो नाधर्मश्चेत्यत्र दृष्टान्त उच्यते-(देवा भागं यथा॰) यथा पूर्वे सं जानाना ये सम्यग् ज्ञानवन्तो देवा विद्वांस आप्ताः पक्षपातरहिता ईश्वरधर्मोपदेश-प्रियाश्चासन्,युष्मत्पूर्वं विद्यामधीत्य वर्त्तन्ते,किंवा ये मृतास्ते यथा भागं भजनीयं सर्वशक्तिमदादि-लक्षणमीश्वरं मदुक्तं धर्मं चोपासते। तथैव युष्माभिरपि स एव धर्म उपासनीयो यतो वेदप्रतिपाद्यो धर्मो निश्शङ्कतया विदितश्च भवेत्॥1॥



भाषार्थ-अब वेदों की रीति से धर्म के लक्षणों का वर्णन किया जाता है- (सं गच्छध्वं) देखो, परमेश्वर हम सभी के लिये धर्म का उपदेश करता है कि, हे मनुष्य लोगो! जो पक्षपातरहित न्याय सत्याचरण से युक्त धर्म है, तुम लोग उसी को ग्रहण करो, उस से विपरीत कभी मत चलो, किन्तु उसी की प्राप्ति के लिए विरोध को छोड़ के परस्पर सम्मति में रहो, जिस से तुम्हारा उत्तम सुख सब दिन बढ़ता जाय और किसी प्रकार का दुःख न हो (संवदध्वं॰) तुम लोग विरुद्ध वाद को छोड़ के परस्पर अर्थात् आपस में प्रीति के साथ पढ़ना पढ़ाना, प्रश्न उत्तर सहित संवाद करो, जिस से तुम्हारी सत्यविद्या नित्य बढ़ती रहे (सं वो मनांसि जानताम्) तुम लोग अपने यथार्थ ज्ञान को नित्य बढ़ाते रहो, जिस से तुम्हारा मन प्रकाशयुक्त होकर पुरुषार्थ को नित्य बढ़ावे, जिस से तुम लोग ज्ञानी होके नित्य आनन्द में बने रहो और तुम लोगों को धर्म का ही सेवन करना चाहिए, अधर्म का नहीं। (देवा भागं यथा॰) जैसे पक्षपातरहित धर्मात्मा विद्वान् लोग वेदरीति से सत्यधर्म का आचरण करते हैं, उसी प्रकार से तुम भी करो। क्योंकि धर्म का ज्ञान तीन प्रकार से होता है- एक तो धर्मात्मा विद्वानों की शिक्षा, दूसरा आत्मा की शुद्धि तथा सत्य को जानने की इच्छा, और तीसरा परमेश्वर की कही वेदविद्या को जानने से ही मनुष्यों को सत्य असत्य का यथावत् बोध होता है, अन्यथा नहीं॥1॥





समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम् ।



समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि ॥2॥



-ऋ॰ अ॰ 8। अ॰ 8। व॰ 49। मं॰ 3॥



भाष्यम्-(समानो मन्त्रः) हे मानवा! वो युष्माकं मन्त्रोऽर्थान्मामीश्वरमारभ्य पृथिवी-पर्यन्तानां गुप्तप्रसिद्ध-सामर्थ्य-गुणानां पदार्थानां भाषणमुपदेशनं ज्ञानं वा भवति यस्मिन् येन वा स मन्त्रो विचारो भवितुमर्हति,तद्यथा राज्ञो मन्त्री सत्यासत्य-विवेककर्त्तेत्यर्थः,सोऽपि सत्यज्ञानफलः,सर्वोपकारकः,समानस्तुल्योऽर्थाद् विरोधरहित एव भवतु। यदा बहुभिर्मनुष्यैर्मिलित्वा सन्दिग्धपदार्थानां विचारः कर्त्तव्यो भवेत्तदा प्रथमतः पृथक् पृथगपि सभासदां मतानि भवेयुस्तत्रापि सर्वेभ्यः सारं गृहीत्वा यद्यत्सर्वमनुष्यहितकारकं सद्गुणलक्षणान्वितं मतं स्यात्तत्तत्सर्वं ज्ञात्वैकत्र कृत्वा नित्यं समाचरत। यतः प्रतिदिनं सर्वेषां मनुष्याणामुत्तरोत्तरमुत्तमं सुखं वर्धेत। तथा (समितिः समानी) समितिः सामाजिकनियमव्यवस्था अर्थाद्या न्यायप्रचाराढ्या सर्वमनुष्याणां मान्यज्ञानप्रदा ब्रह्मचर्यविद्याभ्यास-शुभगुणसाधिका शिष्टसभया राज्यप्रबन्धाद्याह्लादिता परमार्थव्यवहार-शोधिका बुद्धि-शरीर-बलारोग्य-वर्द्धिनी शुभमर्य्यादापि समानी सर्वमनुष्य-स्वतन्त्र-दान-सुख-वर्धनायैकरसैव कार्य्येति(समानं मनः॰) मनः सङ्कल्प-विकल्पात्मकं सङ्कल्पोऽभिलाषेच्छेत्यादि,विकल्पोऽप्रीतिर्द्वेष इत्यादि,शुभगुणान् प्रति सङ्कल्पः,अशुभगुणान्प्रति विकल्पश्च रक्षणीयः। एतद्धर्मकं युष्माकं मनः समानमन्योन्यम-विरुद्धस्वभावमेवास्तु। यच्चित्तं पूर्वपरानुभूतं स्मरणात्मकं धर्मेश्वरचिन्तनं तदपि समानमर्थात् सर्वप्राणिनां दुःखनाशाय सुखवर्धनाय च स्वात्मवत् सम्यक् पुरुषार्थेनैव कार्य्यम् (सह) युष्माभिः परस्परस्य सुखोपकारायैव सर्वं सामर्थ्यं योजनीयम् (एषां) ये ह्येषां सर्वजीवानां सङ्गे स्वात्मवद्वर्त्तन्ते तादृशानां परोपकारिणां परसुख-दातॄणामुपर्य्यहं कृपालुर्भूत्वा(अभिमन्त्रये वः) युष्मान् पूर्वपरोक्तं धर्ममाज्ञापयामि। इत्थमेव सर्वैः कर्तव्यमिति,येन युष्माकं मध्ये नैव कदाचित् सत्यनाशोऽसत्यवृद्धिश्च भवेत्। (समानेन वो॰) हविर्दानं ग्रहणं च,तदपि सत्येन धर्मेण युक्तमेव कार्य्यम्। तेन समानेनैव हविषा वो युष्मान् जुहोमि,सत्यधर्मेण सहैवाहं सदा नियोजयामि। अतो मदुक्त एव धर्मो मन्तव्यो नान्य इति॥2॥



भाषार्थ-(समानो मन्त्रः) हे मनुष्य लोगो! जो तुम्हारा मन्त्र अर्थात् सत्य असत्य का विचार है, वह समान हो, उस में किसी प्रकार का विरोध न हो और जब जब तुम लोग मिल के विचार करो, तब तब सब के वचनों को अलग अलग सुन के, जो जो धर्मयुक्त और जिस में सब का हित हो सो सो सब में से अलग करके, उसी का प्रचार करो, जिस से तुम सभी का बराबर सुख बढ़ता जाय। (समितिः समानी) और जिस में सब मनुष्यों का मान, ज्ञान, विद्याभ्यास ब्रह्मचर्य आदि आश्रम, अच्छे-अच्छे काम, उत्तम मनुष्यों की सभा से राज्य के प्रबन्ध का यथावत् करना और जिस से बुद्धि, शरीर, बल पराक्रम आदि गुण बढ़ें तथा परमार्थ और व्यवहार शुद्ध हों, ऐसी जो उत्तम मर्यादा है, सो भी तुम लोगों की एक ही प्रकार की हो जिस से तुम्हारे सब श्रेष्ठ काम सिद्ध होते जायें। (समानं मनः सह चित्तं) हे मनुष्य लोगो! तुम्हारा मन भी आपस में विरोधरहित, अर्थात् सब प्राणियों के दुःख के नाश और सुख की वृद्धि के लिए अपने आत्मा के समतुल्य पुरुषार्थ वाला हो। शुभ गुणों की प्राप्ति की इच्छा को 'सङ्कल्प' और दुष्ट गुणों के त्याग की इच्छा को 'विकल्प'





कहते हैं, जिस से जीवात्मा ये दोनों कर्म करता है, उस का नाम 'मन' है। उस से सदा पुरुषार्थ करो। जिस से तुम्हारा धर्म सदा दृढ़ और अविरुद्ध हो तथा 'चित्त' उस को कहते हैं, कि जिस से सब अर्थों का स्मरण अर्थात् पूर्वापर कर्मों का यथावत् विचार हो, वह भी तुम्हारा एक सा हो (सह) जो तुम्हारा मन और चित्त हैं, ये दोनों सब मनुष्यों के सुख ही के लिये प्रयत्न में रहें। (एषां) इस प्रकार से जो मनुष्य सब का उपकार करने और सुख देने वाले हैं, मैं उन्हीं पर सदा कृपा करता हूं। (समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः) अर्थात् मैं उन के लिए आशीर्वाद और आज्ञा देता हूं कि सब मनुष्य मेरी इस आज्ञा के अनुकूल चलें, जिस से उन का सत्य धर्म बढ़े और असत्य का नाश हो। (समानेन वो हविषा जुहोमि) हे मनुष्य लोगो! जब जब कोई पदार्थ किसी को दिया चाहो अथवा किसी से ग्रहण किया चाहो, तब तब धर्म से युक्त ही करो। उस से विरुद्ध व्यवहार को मत करो और यह बात निश्चय करके जान लो कि मैं सत्य के साथ तुम्हारा और तुम्हारे साथ सत्य का संयोग करता हूं। इसलिये कि तुम लोग इसी को धर्म मान के सदा करते रहो और इस से भिन्न को धर्म कभी मत मानो॥2॥



समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः ।



समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥3॥-ऋ॰ अ॰ 8। अ॰ 8। व॰ 49। मं॰ 4।



भाष्यम्-अस्यायमभिप्रायः-हे मानवा वो युष्माकं यत्सर्वं सामर्थ्यमस्ति तद्धर्मसम्बन्धे परस्परमविरुद्धं कृत्वा सर्वैः सुखं सदा संवर्धनीयमिति। (समानी व॰) आकूतिरध्यवसाय उत्साह आप्तरीतिर्वा सापि वो युष्माकं परस्परोप-कारकरणेन सर्वेषां जनानां सुखायैव भवतु। यथा मदुपदिष्टस्यास्य धर्मस्य विलोपो न स्यात्तथैव कार्य्यम्।(समाना हृदयानि वः) वो युष्माकं हृदयान्यर्थान्मानसानि प्रेमप्रचुराणि कर्माणि निर्वैराय समानान्यविरुद्धान्येव सन्तु। (समानमस्तु वो मनः)। अत्र प्रमाणम्-



कामः सङ्कल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिर्हीर्धीर्भीरत्येतत्सर्वं मन एव तस्मादपि पृष्ठत उपस्पृष्टो मनसा विजानाति॥-श॰ कां॰ 14। अ॰ 4॥



मनसा विविच्य पुनरनुष्ठातव्यम्। शुभगुणानामिच्छा'कामः'तत्प्राप्त्यनुष्ठानेच्छा'सङ्कल्पः'। पूर्वं संशयं कृत्वा पुनर्निश्चयकरणेच्छा संशयो'विचिकित्सा'। ईश्वरसत्य-धर्मादिगुणानामुपर्यत्यन्तं विश्वासः'श्रद्धा'। अनीश्वरवादाधर्माद्युपरि सर्वथा ह्यनिश्चयोऽश्रद्धा। सुखदुःख-प्राप्त्यापीश्वर-धर्माद्युपरि सदैव निश्चयरक्षणं'धृतिः'। अशुभगुणानामाचरणं नैव कार्य्यमित्यधैर्य्यमधृतिः। सत्यधर्मानामाचरणेऽसत्याचरणे च मनसः सङ्कोचो घृणा'ह्रीः'। शुभगुणान् शीघ्रं धारयेदिति धारणावती वृत्ति'र्धीः'। असत्याचरणादीश्वराज्ञाभङ्गात् पापाचरणादीश्वरो नः सर्वत्र पश्यतीत्यादि वृत्ति'र्भीः'-एतद्धर्मकं मनो वो युष्माकं समानं तुल्यमस्तु। (यथा वः सुसहासति) हे मनुष्या वो युष्माकं यथा परस्परं सुसहायेन स्वस्ति सम्यक् सुखोन्नतिः स्यात्तथा सर्वैः प्रयत्नो विधेयः। सर्वान् सुखिनो दृष्ट्वा चित्त आह्लादः कार्य्यः। नैव कञ्चिदपि दुःखितं दृष्ट्वा सुखं केनापि कर्तव्यम्,किन्तु यथा सर्वे स्वतन्त्राः सुखिनः स्युस्तथैव सर्वैः कार्य्यमिति॥3॥



भाषार्थ-(समानी व आकूतिः) ईश्वर इस मन्त्र का प्रयोजन कहता है कि हे मनुष्य लोगो!





तुम्हारा जितना सामर्थ्य है, उस को धर्म के साथ मिला के सब सुखों को सब दिन बढ़ाते रहो। निश्चय उत्साह और धर्मात्माओं के आचरण को 'आकूति' कहते हैं। हे मनुष्य लोगो! तुम्हारा सब पुरुषार्थ सब जीवों के सुख के लिए सदा हो, जिस से मेरे कहे धर्म का कभी त्याग न हो और सदा वैसा ही प्रयत्न करते रहो कि जिस से (समाना हृदयानि वः) तुम्हारे हृदय अर्थात् मन के सब व्यवहार आपस में सदा प्रेमसहित और विरोध से अलग रहें। (समानमस्तु वो मनः) मनः शब्द का अनेक बार ग्रहण करने में यह प्रयोजन है कि जिस से मन के अनेक अर्थ जाने जायें-(कामः) प्रथम विचार ही करके सब उत्तम व्यवहारों का आचरण करना और बुरों को छोड़ देना इस का नाम काम है। (सङ्कल्पः)-जो सुख और विद्यादि शुभगुणों को प्राप्त होने के लिए प्रयत्न से अत्यन्त पुरुषार्थ करने की इच्छा है उस को सङ्कल्प कहते हैं। (विचिकित्सा) जो जो काम करना हो उस उस को प्रथम शङ्का कर कर के ठीक निश्चय करने के लिये जो सन्देह करना है उस का नाम विचिकित्सा है। (श्रद्धा)-जो ईश्वर और सत्यधर्म आदि शुभ गुणों में निश्चय से विश्वास को स्थिर रखना है, उस को श्रद्धा जानना। (अश्रद्धा)-अर्थात् अविद्या, कुतर्क, बुरे काम करने, ईश्वर को नहीं मानने और अन्याय आदि अशुभ गुणों से सब प्रकार से अलग रहने का नाम अश्रद्धा समझना चाहिए। (धृतिः) जो सुख, दुःख, हानि, लाभ आदि के होने में भी अपने धीरज को नहीं छोड़ना उस का नाम धृति है। (अधृतिः)-बुरे कामों में दृढ़ न होने को अधृति कहते हैं। (ह्रीः)-अर्थात् जो झूठे आचरण करने और सच्चे कामों को नहीं करने में मन को लज्जित करना है, उस को ह्री कहते हैं। (धीः)-जो श्रेष्ठ गुणों को शीघ्र धारण करने वाली वृत्ति है उस को धी कहते हैं। (भीः)-जो ईश्वर की आज्ञा अर्थात् सत्याचरण धर्म करना और उस से उलटे पाप के आचरण से नित्य डरते रहना अर्थात् ईश्वर हमारे सब कामों को सब प्रकार से देखता है, ऐसा जानकर उस से सदा डरना कि जो मैं पाप करूंगा तो ईश्वर मुझ पर अप्रसन्न होगा-इत्यादि गुण वाली वस्तु का नाम 'मन' है। इस को सब प्रकार से सब के सुख के लिए युक्त करो (यथा वः सुसहासति) हे मनुष्य लोगो! जिस प्रकार अर्थात् पूर्वोक्त धर्मसेवन से तुम लोगों को उत्तम सुखों की बढ़ती हो और जिस श्रेष्ठ सहाय से आपस में एक से दूसरे को सुख बढ़े, ऐसा काम सब दिन करते रहो। किसी को दुःखी देख के अपने मन में सुख मत मानो, किन्तु सब को सुखी करके अपने आत्मा को सुखी जानो। जिस प्रकार से स्वाधीन होके सब लोग सदा सुखी रहें, वैसा ही यत्न करते रहो॥3॥



दृष्ट्वारूपे व्याकरोत् सत्यानृते प्रजापतिः।



अश्रद्धामनृतेऽदधाच्छ्रद्धां सत्ये प्रजापतिः॥4॥-य॰ अ॰ 19। मं॰ 77॥



भाष्यम्-अस्यायम॰(दृष्ट्वा॰)-प्रजापतिः परमेश्वरो धर्ममुपदिशति-सर्वैर्मनुष्यैः सर्वथा सर्वदा सत्य एव सम्यक् श्रद्धा रक्षणीयाऽसत्ये चाश्रद्धेति। (प्रजापतिः) परमेश्वरः (सत्यानृते) धर्माधर्मौ(रूपे) प्रसिद्धाप्रसिद्धलक्षणौ दृष्ट्वा (व्याकरोत्) सर्वज्ञया स्वया विद्यया विभक्तौ कृतवानस्ति। कथमित्यत्राह-(अश्रद्धाम॰) सर्वेषां मनुष्याणामनृतेऽसत्येऽधर्मेऽन्यायेऽश्रद्धामदधात् अर्थादधर्मेऽश्रद्धां कर्तुमाज्ञापयति,तथैव वेदशास्त्र-प्रतिपादिते सत्ये प्रत्यक्षादिभिः प्रमाणैः परीक्षिते पक्षपातरहिते न्याय्ये धर्मे प्रजापतिः सर्वज्ञ ईश्वरः श्रद्धां चादधात्। एवं सर्वैर्मनुष्यैः परमप्रयत्नेन स्वकीयं चित्तं धर्मे प्रवृत्तमधर्मान्निवृत्तं सदैव कार्य्यमिति॥4॥





भाषार्थ-(दृष्ट्वा॰) इस मन्त्र का अभिप्राय यह है कि प्रजापति परमेश्वर जो सब जगत् का स्वामी अर्थात् मालिक है, वह सब मनुष्यों के लिये धर्म का उपदेश करता है, कि सब मनुष्यों को सब प्रकार से सब काल में सत्य में ही प्रीति करनी चाहिए, असत्य में कभी नहीं।



(प्रजापतिः) जब जगत् का अध्यक्ष जो ईश्वर है, सो (सत्यानृते) सत्य जो धर्म और असत्य जो अधर्म है, जिन के प्रकट और गुप्त लक्षण हैं (टिप्पणी- जितना धर्म अधर्म का लक्षण बाहर की चेष्टा के साथ सम्बन्ध रखता है, वह प्रकट और जितना आत्मा के साथ सम्बन्ध रखता है वह गुप्त कहाता है॥) (व्याकरोत्) उन को ईश्वर ने अपनी सर्वज्ञ विद्या के ठीक ठीक विचार से देख के सत्य और झूठ को अलग अलग किया है। सो इस प्रकार से हैं कि (अश्रद्धाम॰) हे मनुष्य लोगो! तुम सब दिन अनृत अर्थात् झूठ अन्याय के करने में अश्रद्धा अर्थात् प्रीति कभी मत करो। वैसा ही (श्रद्धां स॰) सत्य, अर्थात् जो वेदशास्त्रोक्त और जिस की प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से परीक्षा की गई हो वा की जाय, वही पक्षपात से अलग न्यायरूप धर्म है, उस के आचरण में सब दिन प्रीति रक्खो और जो-जो तुम लोगों के लिए मेरी आज्ञा है, उस उस में अपने आत्मा, प्राण और मन को सब पुरुषार्थ तथा कोमल स्वभाव से युक्त करके सदा सत्य ही में प्रवृत्त करो॥4॥



दृते दृंह मा मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्।



मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे। मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे॥5॥



-य॰ अ॰ 36। मं॰ 18॥



भाष्यम्-(दृते दृंह॰) अस्यायम॰-सर्वे मनुष्याः सर्वथा सर्वदा सर्वैः सह सौहार्द्येनैव वर्त्तेरन्निति। सर्वैरीश्वरोक्तोऽयं धर्मः स्वीकार्य्य ईश्वरः प्रार्थनीयश्च,यतो धर्मनिष्ठा स्यात्। तद्यथा-



हे (दृते) सर्वदुःख-विनाशकेश्वर! मदुपरि कृपां विधेहि,यतोऽहं सत्यधर्मं यथावद्विजानीयाम्। पक्षपातरहितस्य सुहृदश्चक्षुषा प्रेमभावेन सर्वाणि भूतानि (मा) मां सदा समीक्षन्तामर्थान्मम मित्राणि भवन्तु। इतीच्छाविशिष्टं मां (दृंह) दृंह सत्यसुखैः शुभगुणैश्च सह सदा वर्धय (मित्रस्याहं) एवमहमपि मित्रस्य चक्षुषा स्वात्मवत्प्रेमबुद्ध्या (सर्वाणि भूतानि समीक्षे) सम्यक् पश्यामि (मित्रस्य च॰) इत्थमेव मित्रस्य चक्षुषा निर्वैरा भूत्वा वयमन्योऽन्यं समीक्षामहे सुखसम्पादनार्थं सदा वर्त्तामहे। इतीश्वरोपदिष्टो धर्मो हि सर्वैर्मनुष्यैरेक एव मन्तव्यः॥5॥



भाषार्थ-(दृते दृंह॰) इस मन्त्र का अभिप्राय यह है कि मनुष्य लोग आपस में सब प्रकार के प्रेमभाव से सब दिन वर्त्तें और सब मनुष्यों को उचित है कि जो वेदों में ईश्वरोक्त धर्म है, उसी को ग्रहण करें और वेदरीति से ही ईश्वर की उपासना करें, कि जिस से मनुष्यों की धर्म में ही प्रवृत्ति हो।



(दृते॰) हे सब दुःखों के नाश करने वाले परमेश्वर! आप हम पर ऐसी कृपा कीजिये कि जिससे हम लोग आपस में वैर को छोड़ के एक दूसरे के साथ प्रेमभाव से वर्त्तें (मित्रस्य मा॰) और सब प्राणी मुझ को अपना मित्र जान के बन्धु के समान वर्त्तें। ऐसी इच्छा से युक्त हम लोगों को (दृंह) सत्य सुख और शुभ गुणों से सदा बढ़ाइये (मित्रस्याहं॰) इसी प्रकार से मैं भी सब मनुष्यादि प्राणियों





को अपने मित्र जानूं और हानि, लाभ, सुख और दुःख में अपने आत्मा के समतुल्य ही सब जीवों को मानूं (मित्रस्य च॰) हम सब लोग आपस में मिल के सदा मित्र भाव रक्खें, और सत्यधर्म के आचरण से सत्य सुखों को नित्य बढ़ावें। जो ईश्वर का कहा धर्म है, यही एक सब मनुष्यों को मानने के योग्य है॥5॥



अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम्।



इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि॥6॥-य॰ अ॰ 1। मं॰ 5॥



भाष्यम्-(अग्ने व्रत॰) अस्याभिप्रा॰-सर्वैर्मनुष्यैरीश्वरस्य सहायेच्छा सदा कार्येति। नैव तस्य सहायेन विना सत्यधर्मज्ञानं तस्यानुष्ठानपूर्तिश्च भवतः।



हे अग्ने व्रतपते! सत्यपते! (व्रतं) सत्यधर्मं चरिष्याम्यनुष्ठास्यामि।



अत्र प्रमाणम्-



सत्यमेव देवा अनृतं मनुष्याः। एतद्ध वै देवा व्रतं चरन्ति यत्सत्यम्।



-श॰ कां॰ 1। अ॰ 1।



सत्याचरणाद्देवा असत्याचरणान्मनुष्याश्च भवन्ति,अतः सत्याचरणमेव धर्ममाहुरिति (तच्छकेयम्) यथा तत्सत्याचरणं धर्मं कर्तुमहं शकेयं समर्थो भवेयम् (तन्मे राध्यताम्) तत्सत्यधर्मानुष्ठानं मे मम भवता राध्यतां कृपया सम्यक् सिद्धं क्रियताम्। किञ्च तद् व्रतमित्यत्राह-(इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि) यत्सत्यधर्मस्यैवाचरण-मनृतादसत्याचरणादधर्मात् पृथग् भूतं तदेवोपैमि प्राप्नोमीति। अस्यैव धर्मस्यानुष्ठानमीश्वरप्रार्थनया स्वपुरुषार्थेन च कर्त्तव्यम्। नापुरुषार्थिनं मनुष्यमीश्वरोऽनुगृह्णाति। यथा चक्षुष्मन्तं दर्शयति नान्धंच,एवमेव धर्मं कर्त्तुमिच्छन्तं पुरुषार्थ-कारिणमीश्वरानुग्रहाभिलाषिणं प्रत्येवेश्वरः कृपालुर्भवति नान्यं प्रति चेति। कुतः?जीवे तत्सिद्धिं कर्त्तुं साधनानामीश्वरेण पूर्वमेव रक्षितत्वात्,तदुपयोगाकरणाच्च। येन पदार्थेन यावानुपकारो ग्रहीतुं शक्यस्तावान् स्वेनैव ग्रहीतव्यस्तदुपरीश्वरानुग्रहेच्छा कार्य्येति॥6॥



भाषार्थ-(अग्ने व्रत॰) इस मन्त्र का अभिप्राय यह है कि सब मनुष्य लोग ईश्वर के सहाय की इच्छा करें क्योंकि उस के सहाय के विना धर्म का पूर्ण ज्ञान और उस का अनुष्ठान पूरा कभी नहीं हो सकता।



हे सत्यपते परमेश्वर! (व्रतं) मैं जिस सत्यधर्म का अनुष्ठान किया चाहता हूं, उस की सिद्धि आप की कृपा से ही हो सकती है। इसी मन्त्र का अर्थ शतपथब्राह्मण में भी लिखा है कि- 'जो मनुष्य सत्य के आचरणरूप व्रत को करते हैं वे देव कहाते हैं, और जो असत्य का आचरण करते हैं उन को मनुष्य कहते हैं।' इससे मैं उस सत्यव्रत का आचरण किया चाहता हूं (तच्छकेयं) मुझ पर आप ऐसी कृपा कीजिये कि जिस से मैं सत्यधर्म का अनुष्ठान पूरा कर सकूं। (तन्मे राध्यतां) उस अनुष्ठान की सिद्धि करने वाले एक आप ही हो। सो कृपा से सत्यरूप धर्म के अनुष्ठान को सदा के लिए सिद्ध कीजिये (इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि) सो यह व्रत है कि जिस को मैं निश्चय से चाहता हूं। उन सब असत्य कामों से छूट के सत्य के आचरण करने में सदा दृढ़ रहूं।



परन्तु मनुष्य को यह करना उचित है कि ईश्वर ने मनुष्यों में जितना सामर्थ्य रक्खा है, उतना





पुरुषार्थ अवश्य करें। उसके उपरान्त ईश्वर के सहाय की इच्छा करनी चाहिए। क्योंकि मनुष्यों में सामर्थ्य रखने का ईश्वर का यही प्रयोजन है कि मनुष्यों को अपने पुरुषार्थ से ही सत्य का आचरण अवश्य करना चाहिए। जैसे कोई मनुष्य आंख वाले पुरुष को ही किसी चीज को दिखला सकता है, अन्धे को नहीं। इसी रीति से जो मनुष्य सत्यभाव पुरुषार्थ से धर्म को किया चाहता है उस पर ईश्वर भी कृपा करता है, अन्य पर नहीं। क्योंकि ईश्वर ने धर्म करने के लिए बुद्धि आदि बढ़ने के साधन जीव के साथ रक्खे हैं। जब जीव उनसे पूर्ण पुरुषार्थ करता है, तब परमेश्वर भी अपने सब सामर्थ्य से उस पर कृपा करता है, अन्य पर नहीं। क्योंकि सब जीव कर्म करने में स्वाधीन और पापों के फल भोगने में कुछ पराधीन भी हैं॥6॥



व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्।



दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते॥7॥-य॰ अ॰ 19। मं॰ 30॥



भाष्यम्-(व्रतेन दीक्षा॰) अस्या॰-यदा मनुष्यो धर्मं जिज्ञासते,सत्यं चिकीर्षति,तदैव सत्यं विजानाति,तत्रैव मनुष्यैः श्रद्धेयम्,नासत्ये चेति।



यो मनुष्यः सत्यं व्रतमाचरति,तदा दीक्षामुत्तमाधिकारं प्राप्नोति। (दीक्षयाप्नोति द॰) यदा दीक्षितः सन्नुत्तमगुणैरुत्तमाधिकारी भवति तदा सर्वतः सत्कृतः फलवान् भवति,साऽस्य दक्षिणा भवति,तां दीक्षया शुभगुणाचरणेनैवाप्नोति।(दक्षिणा श्रद्धा॰) सा दक्षिणा यदा ब्रह्मचर्य्यादिसत्यव्रतैः सत्काराढ्या स्वस्यान्येषां च भवति,तदाचरणे श्रद्धां दृढं विश्वासमुत्पादयति। कुतः?सत्याचरणमेव सत्कारकारकमस्त्यतः(श्रद्धया॰) यदोत्तरोत्तरं श्रद्धा वर्धेत,तदा तथा श्रद्धया मनुष्यैः परमेश्वरो मोक्षधर्मादिकं चाप्यते प्राप्यते,नान्यथेति। अतः किमागतं,सत्यप्राप्त्यर्थं सर्वदा श्रद्धोत्साहादिपुरुषार्थो वर्धयितव्यः॥7॥



भाषार्थ-(व्रतेन दी॰) इस मन्त्र का अभिप्राय यह है कि जब मनुष्य धर्म को जानने की इच्छा करता है, तभी सत्य को जानता है। उसी सत्य में मनुष्यों को श्रद्धा करनी चाहिए, असत्य में कभी नहीं।



(व्रतेन॰) जो मनुष्य सत्य के आचरण को दृढ़ता से करता है, तब वह दीक्षा अर्थात् उत्तम अधिकार के फल को प्राप्त होता है। (दीक्षयाप्नोति॰) जब मनुष्य उत्तमगुणों से युक्त होता है तब सब लोग सब प्रकार से उस का सत्कार करते हैं। क्योंकि धर्म आदि शुभगुणों से ही उस दक्षिणा को मनुष्य प्राप्त होता है, अन्यथा नहीं (दक्षिणा श्रद्धा॰) जब ब्रह्मचर्य आदि सत्य व्रतों से अपना और दूसरे मनुष्यों का अत्यन्त सत्कार होता है, तब उसी में दृढ़ विश्वास होता है। क्योंकि सत्यधर्म का आचरण ही मनुष्यों का सत्कार कराने वाला है। (श्रद्धया॰) फिर सत्य के आचरण में जितनी जितनी अधिक श्रद्धा बढ़ती जाती है उतना उतना ही मनुष्य लोग व्यवहार और परमार्थ के सुख को प्राप्त होते जाते हैं, अधर्माचरण से नहीं इस से क्या सिद्ध हुआ, कि सत्य की प्राप्ति के लिए सब दिन श्रद्धा और उत्साह आदि पुरुषार्थ को मनुष्य लोग बढ़ाते ही जायं, जिस से सत्यधर्म की यथावत् प्राप्ति हो॥7॥



श्रमेण तपसा सृष्टा ब्रह्मणा वित्त ऋते श्रिता॥8॥



सत्येनावृता श्रिया प्रावृता यशसा परीवृता॥9॥-अथर्व॰ कां॰ 12। अनु॰ 5। मं॰ 1। 2॥





भाष्यम्-(श्रमेण तपसा॰) अभिप्रा॰-श्रमेणेत्यादिमन्त्रेषु धर्मस्य लक्षणानि प्रकाश्यन्त इति।



श्रमः प्रयत्नः पुरुषार्थ उद्यम इत्यादि। तपो धर्मानुष्ठानम्,तेन श्रमेणैव तपसा च सहेश्वरेण सर्वे मनुष्याः सृष्टा रचिताः। अतः(ब्रह्मणा॰) वेदेन परमेश्वरज्ञानेन च युक्ताः सन्तो ज्ञानिनः स्युः। (ऋते श्रिता॰) ऋते ब्रह्मणि पुरुषार्थे चाश्रिता,ऋतं सेवमानाश्च सदैव भवन्तु॥8॥



(सत्येनावृ॰) वेदशास्त्रेण प्रत्यक्षादिभिः प्रमाणैश्च परीक्षितेनाव्यभिचारिणा सत्येनावृता युक्ताः सर्वे मनुष्याः सन्तु। (श्रिया प्रावृता॰) श्रिया शुभगुणाचरणोज्ज्वलया चक्रवर्तिराज्यसेवमानया प्रकृष्टया लक्ष्म्याऽऽवृता युक्ताः परमप्रयत्नेन भवन्तु। (यशसा॰) उत्कृष्टगुणग्रहणं सत्याचरणं यशस्तेन परितः सर्वतो वृता युक्ताः सन्तः प्रकाशयितारश्च स्युः॥9॥



भाषार्थ-(श्रमेण तपसा॰) इन मन्त्रों के अभिप्राय से यह सिद्ध होता है कि सब मनुष्यों को (श्रमेण॰) इत्यादि धर्म के लक्षणों का ग्रहण अवश्य करना चाहिए।



क्योंकि ईश्वर ने (श्रम॰) जो परम प्रयत्न करना, और (तपः॰) जो धर्म का आचरण करना है, इसी धर्म से युक्त मनुष्यों को रचा है, इस कारण से (ब्रह्मणा) ब्रह्म जो वेदविद्या और परमेश्वर के ज्ञान से युक्त होके सब मनुष्य अपने अपने ज्ञान को बढ़ावें (ऋते श्रिता) सब मनुष्य ऋत जो ब्रह्म, सत्यविद्या और धर्माचरण इत्यादि शुभगुणों का सेवन करें॥8॥



(सत्येनावृता) सब मनुष्य प्रत्यक्षादि प्रमाणों से सत्य की परीक्षा करके सत्य के आचरण से युक्त हों। (श्रिया प्रावृता) हे मनुष्य लोगो! तुम शुभगुणों से प्रकाशित होके, चक्रवर्त्तिराज्य आदि ऐश्वर्य को सिद्ध करके, अतिश्रेष्ठ लक्ष्मी से युक्त हो के, शोभारूप श्री को सिद्ध करके, उस को चारों ओर पहिन के शोभित हों, (यशसा परी॰) सब मनुष्यों को उत्तम गुणों का ग्रहण करके सत्य के आचरण और यश अर्थात् उत्तम कीर्ति से युक्त होना चाहिए॥9॥



स्वधया परिहिता श्रद्धया पर्य्यू्ढा दीक्षया गुप्ता यज्ञे प्रतिष्ठिता लोको नि धनम्॥10॥



ओजश्च तेजश्च सहश्च बलं च वाक् चेन्द्रियं च श्रीश्च धर्मश्च॥11॥



-अथर्व॰ कां॰ 12। अनु॰ 5। मं॰ 3। 7॥



भाष्यम्-(स्वधया परि॰) परितः सर्वतः स्वकीय-पदार्थ-शुभगुण-धारणेनैव सन्तुष्य सर्वे मनुष्याः सर्वेभ्यो हितकारिणः स्युः (श्रद्धया प॰) सत्यमेव विश्वासमूलमस्ति नासदिति,तया सत्योपरि दृढविश्वासरूपया श्रद्धया परितः सर्वत ऊढाः प्राप्तवन्तः सन्तु (दीक्षया गुप्ता) सद्भिराप्तैर्विद्वद्भिः कृतसत्योपदेशया दीक्षया गुप्ता रक्षिताः सर्वमनुष्याणां रक्षितारश्च स्युः। (यज्ञे प्रतिष्ठिताः) (यज्ञो वै विष्णुः) व्यापके परमेश्वरे सर्वोपकारकेऽश्वमेधादौ शिल्पविद्या-क्रियाकुशलत्वे च प्रतिष्ठिताः प्राप्तप्रतिष्ठाश्च भवन्तु। (लोको निधनम्) अयं लोकः सर्वेषां मनुष्याणां निधनं यावन्मृत्युर्न भवेत्तावत् सर्वोपकारकं सत्कर्मानुष्ठानं कर्त्तुं योग्यमस्तीति सर्वैर्मन्तव्यमितीश्वरोपदेशः॥10॥



अन्यच्च-(ओजश्च) न्यायपालनान्वितः पराक्रमः(तेजश्च) प्रगल्भता धृष्टता निर्भयता निर्दीनता सत्ये व्यवहारे कर्त्तव्या (सहश्च) सुखदुःख-हानिलाभादि-क्लेशप्रद-वर्त्तमान-प्राप्तावपि हर्षशोकाकरणं तन्निवारणार्थं परम-प्रयत्नानुष्ठानं च सहनं सर्वैः सदा कर्त्तव्यम् (बलं च) ब्रह्मचर्य्यादि-सुनियमाचरणेन शरीरबुद्ध्यादि-रोग-निराकरणं





दृढाङ्गता-निश्चल-बुद्धित्व-सम्पादनं,भीषणादि-कर्मयुक्तं बलं च कार्य्यमिति (वाक् च) विद्याशिक्षा-सत्य-मधुरभाषणादि-शुभगुणयुक्ता वाणी कार्य्येति (इन्द्रियं च) मन आदीनि वाग्भिन्नानि षड्ज्ञानेन्द्रियाणि वाक् चेति कर्मेन्द्रियाणामुपलक्षणेन कर्मेन्द्रियाणि च सत्यधर्माचरण-युक्तानि पापाद् व्यतिरिक्तानि च सदैव रक्षणीयानि(श्रीश्च) सम्राड्राज्यश्रीः परमपुरुषार्थेन कार्य्येति (धर्मश्च) अयमेव वेदोक्तो न्याय्यः पक्षपातरहितः सत्याचरणयुक्तः सर्वोपकारकश्च धर्मः सदैव सर्वैः सेवनीयः। अस्यैवेयं पूर्वा परा सर्वा व्याख्यास्तीति बोध्यम्॥11॥



भाषार्थ-(स्वधया परिहिता) सब प्रकार से मनुष्य लोग स्वधा अर्थात् अपने ही पदार्थों का धारण करें। इस अमृतरूप व्यवहार से सदा युक्त हों (श्रद्धया पर्य्यूढा) सब मनुष्य सत्य व्यवहार पर अत्यन्त विश्वास को प्राप्त हों। क्योंकि जो सत्य है वही विश्वास का मूल तथा सत्य का आचरण ही उस का फल और स्वरूप है, असत्य कभी नहीं (दीक्षया गुप्ता) विद्वानों की सत्य शिक्षा से रक्षा को प्राप्त हों और मनुष्य आदि प्राणियों की रक्षा में पुरुषार्थ करो। (यज्ञे प्रतिष्ठिता) यज्ञ जो सब में व्यापक अर्थात् परमेश्वर अथवा सब संसार का उपकार करने वाला अश्वमेधादि यज्ञ अथवा जो शिल्पविद्या सिद्ध करके उपकार लेना जो यज्ञ है, इस तीन प्रकार के यज्ञ में सब मनुष्य यथावत् प्रवृत्ति करें। (लोको नि॰) जब तक तुम लोग जीते रहो, तब तक सदा सत्य कर्म में ही पुरुषार्थ करते रहो किन्तु इस में आलस्य कभी मत करो। ईश्वर का यह उपदेश सब मनुष्यों के लिए है॥10॥



(ओजश्च) धर्म के पालन से युक्त जो पराक्रम (तेजश्च) प्रगल्भता अर्थात् भयरहित होके दीनता से दूर रहना (सहश्च) सुख दुःख हानि लाभ आदि की प्राप्ति में भी हर्ष शोकादि छोड़ के सत्यधर्म में दृढ़ रहना, दुःख का निवारण और सहन करना (बलं च) ब्रह्मचर्य आदि अच्छे नियमों से शरीर का आरोग्य बुद्धि की चतुराई आदि बल का बढ़ाना (वाक् च) सत्य विद्या की शिक्षा, सत्य मधुर अर्थात् कोमल प्रिय भाषण का करना (इन्द्रियं च) जो मन, पांच ज्ञानेन्द्रिय और पांच कर्मेन्द्रिय हैं, उन को पाप कर्मों से रोक के सदा सत्य पुरुषार्थ में प्रवृत्त रखना, (श्रीश्च) चक्रवर्ति राज्य की सामग्री को सिद्ध करना (धर्मश्च) जो वेदोक्त न्याय से युक्त हो के, पक्षपात को छोड़ के सत्य ही का सदा आचरण और असत्य का त्याग करना है तथा जो सब का उपकार करने वाला और जिस का फल इस जन्म और परजन्म में आनन्द है, उसी को 'धर्म' और उस से उलटा करने को 'अधर्म' कहते हैं। उसी धर्म की यह सब व्याख्या है कि जो (सं गच्छध्वं॰) इस मन्त्र से लेके 'यतोऽभ्युदय॰' इस सूत्र तक जितने धर्म के लक्षण लिखे हैं, वे सब लक्षण मनुष्यों को ग्रहण करने के योग्य हैं॥11॥



ब्रह्म च क्षत्रं च राष्ट्रं च विशश्च त्विषिश्च यशश्च वर्चश्च द्रविणं च॥12॥



आयुश्च रूपं च नाम च कीर्तिश्च प्राणश्चापानश्च चक्षुश्च श्रोत्रं च॥13॥



पयश्च रसश्चान्नं चान्नाद्यं च ऋतं च सत्यं चेष्टं च पूर्तं च प्रजा च पशवश्च॥14॥



-अथर्व॰ कां॰ 12। अनु॰ 5। मं॰ 8। 9। 10॥



भाष्यम्-इत्याद्यनेक-मन्त्रप्रमाणैर्धर्मोपदेशो वेदेष्वीश्वरेणैव सर्वमनुष्यार्थमुपदिष्टोऽस्ति। (ब्रह्म च) ब्राह्मणोपलक्षणं सर्वोत्तमविद्यागुणकर्मवत्वं सद्गुणप्रचारकरणत्वं च ब्राह्मणलक्षणं तच्च सदैव वर्धयितव्यम् (क्षत्रं च)





क्षत्रियोपलक्षणं विद्या-चातुर्य्य-शौर्य-धैर्य-वीरपुरुषान्वितं च सदैवोन्नेयम् (राष्ट्रं च) सत्पुरुषसभया सुनियमैः सर्वसुखाढ्यं शुभ-गुणान्वितं च राज्यं सदैव कार्य्यम्(विशश्च) वैश्यादिप्रजानां व्यापारादिकारिणां भूगोले ह्यव्याहतगति-सम्पादनेन व्यापाराद्धनवृद्ध्यर्थं संरक्षणं च कार्य्यम् (त्विषिश्च) दीप्तिः शुभगुणानां प्रकाशः सत्यगुणकामना च शुद्धा प्रचारणीयेति (यशश्च) धर्मान्वितानुत्तमा कीर्तिः संस्थापनीया (वर्चश्च) सद्विद्याप्रचारं सम्यगध्ययनाध्यापनप्रबन्धं कर्म सदा कार्य्यम् (द्रविणं च) अप्राप्तस्य पदार्थस्य न्यायेन प्राप्तीच्छा कार्य्या प्राप्तस्य संरक्षणं रक्षितस्य वृद्धिर्वृद्धस्य सत्कर्मसु व्ययश्च योजनीयः एतच्चतुर्विधपुरुषार्थेन धनधान्योन्नतिसुखे सदैव कार्य्ये॥12॥



(आयुश्च) वीर्य्यादिरक्षणेन भोजनाच्छादनादि-सुनियमेन ब्रह्मचर्य्य-सुसेवनेनायुर्बलं कार्य्यम् (रूपं च) निरन्तर-विषयासेवनेन सदैव सौन्दर्य्यादि-गुणयुक्तं स्वरूपं रक्षणीयम् (नाम च) सत्कर्मानुष्ठानेन नामप्रसिद्धिः कार्य्या यतोऽन्यस्यापि सत्कर्मसूत्साहवृद्धिः स्यात् (कीर्तिश्च) सद्गुणग्रहणार्थमीश्वरगुणानामुपदेशार्थं कीर्त्तनं स्वसत्कीर्त्तिमत्वं च सदैव कार्य्यम् (प्राणश्चापानश्च) प्राणायामरीत्या प्राणापानयोः शुद्धिबले कार्य्ये शरीराद् बाह्यदेशं यो वायुर्गच्छति स प्राणः,बाह्याद्देशाच्छरीरं प्रविशति स वायुरपानः,शुद्धदेशनिवासादिनैनयोः प्रच्छर्दन-विधारणाभ्यां बुद्धिः शारीरबलं च सम्पादनीयम् (चक्षुश्च श्रोत्रं च) चाक्षुषं प्रत्यक्षं श्रौत्रं शब्दजन्यं,चादनुमानादीन्यपि प्रमाणानि यथावद्वेदितव्यानि,तैः सत्यं विज्ञानं च सर्वथा कार्य्यम्॥13॥



(पयश्च रसश्च) पयो जलादिकं रसो दुग्धघृतादिश्चैता वैद्यकरीत्या सम्यक् शोध यित्वा भोक्तव्यौ (अन्नं चान्नाद्यं च) अन्नमोदनादिकमन्नाद्यं भोक्तुमर्हं शुद्धं संस्कृतमन्नं सम्पाद्यैव भोक्तव्यम् (ऋतं च सत्यं च) ऋतं ब्रह्म सर्वदैवोपासनीयम्,सत्यं प्रत्यक्षादिभिः प्रमाणैः परीक्षितं यादृशं स्वात्मन्यस्ति तादृशं सदा सत्यमेव वक्तव्यं मन्तव्यं च(इष्टं च पूर्त्तं च) इष्टं ब्रह्मोपासनं सर्वोपकारकं यज्ञानुष्ठानं च,पूर्त्तं तु यत्पूर्त्यर्थं मनसा वाचा कर्मणा सम्यक् पुरुषार्थेनैव सर्ववस्तुसम्भारैश्चोभयानुष्ठानपूर्त्तिः कार्येति (प्रजा च पशवश्च) प्रजा सन्तानादिका राज्यं च सुशिक्षा-विद्यासुखान्विता हस्त्यश्वादयः पशवश्च सम्यक् शिक्षान्विताः कार्य्याः। बहुभिश्चकारैरन्येऽपि शुभगुणा अत्र ग्राह्याः॥14॥



भाषार्थ-(ब्रह्म च) सब से उत्तम विद्या और श्रेष्ठ कर्म करने वालों को ही ब्राह्मण वर्ण का अधिकार देना, उन से विद्या का प्रचार कराना और उन लोगों को भी चाहिए कि विद्या के प्रचार में ही सदा तत्पर रहें। (क्षत्रं च) अर्थात् सब कामों में चतुरता, शूरवीरपन, धीरज, वीरपुरुषों से युक्त सेना का रखना, दुष्टों को दण्ड देना और श्रेष्ठों का पालन करना इत्यादि गुणों के बढ़ाने वाले पुरुषों को क्षत्रियवर्ण का अधिकार देना। (राष्ट्रञ्च) श्रेष्ठ पुरुषों की सभा के अच्छे नियमों से राज्य को सब सुखों से युक्त करना और उत्तम गुण सहित होके सब कर्मों को सदा सिद्ध करना चाहिए (विशश्च) वैश्य आदि वर्णों को व्यापारादि व्यवहारों में भूगोल के बीच में जाने आने का प्रबन्ध करना और उन की अच्छी रीति से रक्षा करनी अवश्य है, जिस से धनादि पदार्थों की संसार में बढ़ती हो (त्विषिश्च) सब मनुष्यों में सब दिन सत्य गुणों ही का प्रकाश करना चाहिए। (यशश्च) उत्तम कामों से भूगोल में श्रेष्ठ कीर्ति को बढ़ाना उचित है। (वर्चश्च) सत्यविद्याओं के प्रचार के लिए अनेक पाठशालाओं में पुत्र और कन्याओं का अच्छी रीति से पढ़ने पढ़ाने का प्रचार सदा बढ़ाते जाना चाहिए।





(द्रविणं च) सब मनुष्यों को उचित है कि पूर्वोक्त धर्म से अप्राप्त पदार्थों की प्राप्ति की इच्छा से सदा पुरुषार्थ करना प्राप्त पदार्थों की रक्षा यथावत् करनी चाहिये। रक्षा किये पदार्थों की सदा बढ़ती करना और सत्य विद्या के प्रचार आदि कामों में बढ़े हुए धनादि पदार्थों का खरच यथावत् करना चाहिए। इस चार प्रकार के पुरुषार्थ से धनधान्यादि को बढ़ा के सुख को सदा बढ़ाते जाओ॥12॥



(आयुश्च) वीर्य्य आदि धातुओं की शुद्धि और रक्षा करना तथा युक्तिपूर्वक ही भोजन और वस्त्र आदि का जो धारण करना है, इन अच्छे नियमों से उमर को सदा बढ़ाओ। (रूपं च) अत्यन्त विषय-सेवा से पृथक् रह के और शुद्ध वस्त्र आदि धारण से शरीर का स्वरूप सदा उत्तम रखना। (नाम च) उत्तम कर्मों के आचरण से नाम की प्रसिद्धि करनी चाहिए, जिस से अन्य मनुष्यों का भी श्रेष्ठ कर्मों में उत्साह हो। (कीर्तिश्च) श्रेष्ठ गुणों के ग्रहण के लिए परमेश्वर के गुणों का श्रवण और उपदेश करते रहो, जिस से तुम्हारा भी यश बढ़े (प्राणश्चापानश्च) जो वायु भीतर से बाहर आता है उसको 'प्राण' और जो बाहर से भीतर जाता है, उसको 'अपान' कहते हैं। योगाभ्यास, शुद्ध देश में निवास आदि और भीतर से बल करके प्राण को बाहर निकाल के रोकने से शरीर के रोगों को छुड़ा के बुद्धि आदि को बढ़ाओ (चक्षुश्च श्रोत्रं च) प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, ऐतिह्य, अर्थापत्ति, सम्भव और अभाव, इन आठ प्रमाणों के विज्ञान से सत्य का नित्य शोधन करके ग्रहण किया करो॥13॥



(पयश्च रसश्च) जो पय अर्थात् दूध, जल आदि और जो रस अर्थात् शक्कर, ओषधि और घी आदि हैं, इन को वैद्यकशास्त्रों की रीति से यथावत् शोध के भोजन आदि करते रहो। (अन्नं चान्नाद्यं च) वैद्यकशास्त्र की रीति से चावल आदि अन्न का यथावत् संस्कार करके भोजन करना चाहिए (ऋतं च सत्यं च) ऋत नाम जो ब्रह्म है, उसी की सदा उपासना करनी। जैसा हृदय में ज्ञान हो सदा वैसा ही भाषण करना और सत्य को ही मानना चाहिये। (इष्टं च पूर्तं च) इष्ट जो ब्रह्म है उसी की उपासना और जो पूर्वोक्त यज्ञ सब संसार को सुख देने वाला है, उस इष्ट की सिद्धि करने की पूर्ति और जिस-जिस उत्तम कामों के आरम्भ को यथावत् पूर्ण करने के लिये जो-जो अवश्य हो सो-सो सामग्री पूर्ण करनी चाहिए (प्रजा च पशवश्च) सब मनुष्य लोग अपने सन्तान और राज्य को अच्छी शिक्षा दिया करें, और हस्ती तथा घोड़े आदि पशुओं को भी अच्छी रीति से सुशिक्षित करना उचित है। इन मन्त्रों में अनेक चकारों का यह भी प्रयोजन है कि सब मनुष्य लोग धर्म के अन्य भी शुभ लक्षणों का ग्रहण करें॥14॥



भाष्यम्-अत्र धर्मविषये तैत्तिरीयशाखाया अन्यदपि प्रमाणम्-



ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यं च स्वा॰। तपश्च स्वा॰। दमश्च स्वा॰। शमश्च स्वा॰। अग्नयश्च स्वा॰। अग्निहोत्रं च स्वा॰। अतिथयश्च स्वा॰। मानुषं च स्वा॰। प्रजा च स्वा॰। प्रजनश्च स्वा॰। प्रजातिश्च स्वा॰। सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः। तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः। स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः। तद्धि तपस्तद्धि तपः॥1॥





वेदमनूच्याचार्य्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति। सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। आचार्य्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः। सत्यान्न प्रमदितव्यम्। धर्मान्न प्र॰। कुशलान्न प्र॰। भूत्यै न प्र॰। स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्र॰। देवपितृकार्य्याभ्यां न प्र॰। मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्य्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव। यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि॥2॥



ये के चास्मच्छ्रेयांसो ब्राह्मणाः तेषां त्वयासनेन प्रश्वसितव्यम्। श्रद्धया देयम्। अश्रद्धया देयम्। श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्। भिया देयम्। संविदा देयम्। अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात्। ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः युक्ता अयुक्ताः अलूक्षा धर्मकामाः स्युः,यथा ते तत्र वर्त्तेरन्,तथा तत्र वर्त्तेथाः। अथाभ्याख्यातेषु ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः,युक्ता अयुक्ता अलूक्षा धर्मकामाः स्युः,यथा ते तेषु वर्त्तेरन् तथा वर्त्तेथाः। एष आदेशः। एष उपदेशः। एषा वेदोपनिषत्। एतदनुशासनम्। एवमुपासितव्यम्। एवमु चैतदुपास्यम्॥3॥



-तैत्तिरीय आरण्यके प्रपा॰ 7। अनु॰ 9। 11॥



भाष्यम्-(एतेषामभि॰)-सर्वैर्मनुष्यैरेतानि वक्ष्यमाणानि धर्मलक्षणानि सदैव सेव्यानीति। (ऋतं च॰) यथार्थस्वरूपं वा ज्ञानम् (सत्यं च॰) सत्यस्याचरणं च (तपश्च॰) ज्ञानधर्मयोर्ऋतादिधर्म्मलक्षणानां यथावदनुष्ठानम् (दमश्च॰) अधर्माचरणादिन्द्रियाणि सर्वथा निवत्र्त्य तेषां सत्यधर्माचरणे सदैव प्रवृत्तिः कार्य्या (शमश्च॰) नैव मनसापि कदाचिदधर्मकरणेच्छा कार्य्येति। (अग्नयश्च॰) वेदादिशास्त्रेभ्योऽग्न्यादिपदार्थेभ्यश्च पारमार्थिक- व्यवहारिक-विद्योपकारकरणम्(अग्निहोत्रं च॰) नित्यहोममारभ्याश्वमेध-पर्य्यन्तेन यज्ञेन वायुवृष्टिजलशुद्धिद्वारा सर्वप्राणिनां सुखसम्पादनं कार्य्यम् (अतिथय॰) पूर्णविद्यावतां धर्मात्मनां सङ्गसेवाभ्यां सत्यशोधनं छिन्नसंशयत्वं च कार्य्यम्(मानुषं च॰) मनुष्यसम्बन्धि- राज्यविद्यादिवित्तं सम्यक् सिद्धं कर्त्तव्यम् (प्रजा च॰) धर्मेणैव प्रजामुत्पाद्य सा सदैव सत्यधर्मविद्या-सुशिक्षयान्विता कार्य्या(प्रजनश्च॰) वीर्य्यवृद्धिः पुत्रेष्टिरीत्या ऋतुप्रदानं च कर्त्तव्यम्(प्रजातिश्च॰) गर्भरक्षा जन्मसमये संरक्षणं सन्तानशरीर-बुद्धिवर्धनं च कर्त्तव्यम्(सत्यमिति॰) मनुष्यः सदा सत्यवक्तैव भवेदिति राथीतराचार्य्यस्य मतमस्ति (तप इति॰) यदृतादिसेवनेनैव सत्यविद्याधर्मानुष्ठानमस्ति तन्नित्यमेव कर्तव्यमिति पौरुशिष्टेराचार्य्यस्य मतमस्ति। परन्तु नाको मौद्गल्यस्येदं मतमस्ति-स्वाध्यायो वेदविद्याध्ययनं प्रवचनं तदध्यापनं चेत्युभयं सर्वेभ्यः श्रेष्ठतमं कर्मास्ति,इदमेव मनुष्येषु परमं तपोऽस्ति,नातः परमुत्तमं धर्मलक्षणं किञ्चिद्विद्यत इति।



(वेदमनूच्या॰) आचार्य्यः शिष्याय वेदानध्याप्य धर्ममुपदिशति-हे शिष्य! त्वया सदैव सत्यमेव वक्तव्यं,सत्यभाषणादिलक्षणो धर्मश्च सेवनीयः। शास्त्राध्ययनाध्यापने कदापि नैव त्याज्ये। आचार्य्यसेवा प्रजोत्पत्तिश्च,सत्यधर्मकुशलतैश्वर्य्य-संवर्धनसेवने सदैव कर्तव्ये। देवा विद्वांसः,पितरो ज्ञानिनश्च तेभ्यो ज्ञानग्रहणं तेषां सेवनं च सदैव कार्य्यमेव मातृपित्राचार्य्यातिथीनां सेवनं चैतत्सर्वं सम्प्रीत्या कर्त्तव्यम्। नैतत्कदापि प्रमादात्त्याज्य- मिति। वक्ष्यमाणरीत्या मात्रादय उपदिशेयुः-भोः पुत्राः यान्युत्तमानि कर्म्माणि वयं कुर्मस्तान्येव युष्माभिराचरितव्यानि। यानि तु पापात्मकानि कानिचिदस्माभिः क्रियन्ते तानि कदापि नैवाचरणीयानि।





येऽस्माकं मध्ये विद्वांसो ब्रह्मविदः स्युस्तत्सङ्गस्तदुक्त-विश्वासश्च सदैव कर्त्तव्यो नेतरेषाम्। मनुष्यैर्विद्यादि-पदार्थदानं प्रीत्याऽप्रीत्या,श्रिया,लज्जया,भयेन,प्रतिज्ञया च सदैव कर्त्तव्यम्। अर्थात् प्रतिग्रहाद्दानमतीव श्रेयस्करमिति। भोः शिष्य! तव कस्मिंश्चित् कर्मण्याचरणे च संशयो भवेत् तदा ब्रह्मविदां,पक्षपातरहितानां योगिनामधर्मात् पृथग्भूतानां,विद्यादिगुणैः स्निग्धानां,धर्मकामानां विदुषां सकाशादुत्तरं ग्राह्यं,तेषामेवाचरणं च। यादृशेन मार्गेण ते विचरेयुस्तेनैव मार्गेण त्वयापि गन्तव्यम्। अयमेव युष्माकं हृदय आदेश उपदेशो हि स्थाप्यत इयमेव वेदानामुपनिषदस्ति। ईदृशमेवानुशासनं सर्वैर्मनुष्यैः कर्त्तव्यम्। ईदृगाचरणपुरःसरमेव परमश्रद्धया सच्चिदानन्दादिलक्षणं ब्रह्मोपास्यं नान्यथेति।



भाषार्थ-तैत्तिरीयशाखा में और भी धर्म का विषय है सो आगे लिखते हैं- (ऋतं च॰) यह सब मनुष्यों को उचित है कि अपने ज्ञान और विद्या को बढ़ाते हुए एक ब्रह्म ही की उपासना करते रहें। उस के साथ वेदादि शास्त्रों का पढ़ना पढ़ाना भी बराबर करते जायें। (सत्यं च॰) प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से ठीक ठीक परीक्षा करके जैसा तुम अपने आत्मा में ज्ञान से जानते हो, वैसा ही बोलो और उसी को मानो। उस के साथ पढ़ना पढ़ाना भी कभी न छोड़ो। (तपश्च॰) विद्याग्रहण के लिए ब्रह्मचर्य आश्रम को पूर्ण करके सदा धर्म में निश्चित रहो। (दमश्च॰) अपनी आंख आदि इन्द्रियों को अधर्म अैर आलस्य से छुड़ा के सदा धर्म में चलाओ। (शमश्च॰) अपने आत्मा और मन को सदा धर्मसेवन में ही स्थिर रक्खो। (अग्नयश्च॰) तीनों वेद और अग्नि आदि पदार्थों से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध करो तथा अनेक प्रकार से शिल्पविद्या की उन्नति करो। (अग्निहोत्रं च॰) वायु और वृष्टिजल की शुद्धि द्वारा अग्निहोत्र से लेके अश्वमेध पर्यन्त यज्ञों से सब सृष्टि का उपकार सदा करते रहो। (अतिथयश्च॰) जो सब जगत् के उपकार के लिए सत्यवादी, सत्यकारी, पूर्ण विद्वान्, सब का सुख चाहने वाले हों, उन सत्पुरुषों के सङ्ग से करने के योग्य व्यवहारों को सदा बढ़ाते रहो। (मानुषं च॰) सब मनुष्यों के राज्य और प्रजा के ठीक ठीक प्रबन्ध से धन आदि पदार्थों को बढ़ा के, रक्षा करके और अच्छे कामों में खर्च करके, उन से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चारों फलों की सिद्धि द्वारा अपना जन्म सफल करो। (प्रजा च॰) अपने सन्तानों का यथायोग्य पालन, शिक्षा से विद्वान् करके, सदा धर्मात्मा और पुरुषार्थी बनाते रहो। (प्रजनश्च॰) जो सन्तानों की उत्पत्ति करने का व्यवहार है उस को 'पुत्रेष्टि' कहते हैं, उस में श्रेष्ठ भोजन और ओषध सेवन सदा करते रहो तथा ठीक-ठीक गर्भ की रक्षा भी करो। (प्रजातिश्च॰) पुत्र और कन्याओं के जन्म- समय में स्त्री और बालकों की रक्षा युक्तिपूर्वक करो।



ऋत से लेके प्रजाति पर्यन्त धर्म के जो बारह लक्षण होते हैं, उन सब के साथ स्वाध्याय जो पढ़ना और प्रवचन जो पढ़ाने का उपदेश किया है, सो इसलिए है कि पूर्वोक्त जो धर्म के लक्षण हैं, वे तब प्राप्त हो सकते हैं कि जब मनुष्य लोग सत्यविद्या को पढ़ें, और तभी सदा सुख में रहेंगे क्योंकि सब गुणों में विद्या ही उत्तम गुण है। इसलिये सब धर्मलक्षणों के साथ स्वाध्याय और प्रवचन का ग्रहण किया है। सो इन का त्याग करना कभी न चाहिए। (सत्यमिति॰) हे मनुष्य लोगो! तुम सब दिन सत्यवचन ही बोलो। (तप इति॰) धर्म और ईश्वर की प्राप्ति करने के लिये नित्य विद्या ग्रहण करो, अर्थात् विद्या का जो पढ़ना पढ़ाना है, यही सब से उत्तम है॥1॥





(वेदमनूच्या॰) जो आचार्य अर्थात् विद्या और शिक्षा का देने वाला है, वह विद्या पढ़ने के समय और जब तक न पढ़ चुके तब तक अपने पुत्र और शिष्यों को इस प्रकार उपदेश करे कि- हे पुत्रो वा शिष्य लोगो! तुम सदा सत्य ही बोला करो। और धर्म का ही सेवन करके एक परमेश्वर ही की भक्ति किया करो। इस में आलस्य वा प्रमाद कभी मत करो। आचार्य को अनेक उत्तम पदार्थ देकर प्रसन्न करो। और युवावस्था में ही विवाह करके प्रजा की उत्पत्ति करो तथा सत्यधर्म को कभी मत छोड़ो। कुशलता अर्थात् चतुराई को सदा ग्रहण करके, भूति अर्थात् उत्तम ऐश्वर्य को सदा बढ़ाते जाओ और पढ़ने पढ़ाने में कभी आलस्य मत करो॥2॥



(देवपितृ॰) देव जो विद्वान् लोग और पितृ अर्थात् ज्ञानी लोगों की सेवा और सङ्ग से विद्या के ग्रहण करने में आलस्य वा प्रमाद कभी मत करो। माता, पिता, आचार्य अर्थात् विद्या के देने वाले और अतिथि जो सत्य उपदेश के करने वाले विद्वान् पुरुष हैं, उनकी सेवा में आलस्य कभी मत करो। ऐसे ही सत्यभाषणादि शुभ गुणों और कर्मों ही का सदा सेवन करो किन्तु मिथ्याभाषणादि को कभी मत करो। माता, पिता और आचार्य आदि अपने सन्तानों तथा शिष्यों को ऐसा उपदेश करें कि-हे पुत्रो वा शिष्य लोगो! हमारे जो सुचरित्र अर्थात् अच्छे काम हैं, तुम लोग उन्हीं का ग्रहण करो किन्तु हमारे बुरे कामों को कभी नहीं। जो हमारे बीच में विद्वान् और ब्रह्म के जानने वाले धर्मात्मा मनुष्य हैं, उन्हीं के वचनों में विश्वास करो और उन को प्रीति वा अप्रीति से, श्री वा लज्जा से, भय अथवा प्रतिज्ञा से सदा दान देते रहो तथा विद्यादान सदा करते जाओ। और जब तुम को किसी बात में सन्देह हो तब पूर्ण विद्वान्, पक्षपातरहित, धर्मात्मा मनुष्यों से पूछ के शङ्कानिवारण सदा करते रहो। वे लोग जिस जिस प्रकार से जिस जिस धर्म काम में चलते होवें, वैसे ही तुम भी चलो। यही आदेश अर्थात् अविद्या को हटा के उस के स्थान में विद्या का और अधर्म को हटा के धर्म का स्थापन करना है। इसी को उपदेश और शिक्षा भी कहते हैं। इसी प्रकार शुभ लक्षणों को ग्रहण करके एक परमेश्वर ही की सदा उपासना करो॥3॥



ऋतं तपः सत्यं तपः श्रुतं तपः शान्तं तपो दमस्तपः शमस्तपो दानं तपो यज्ञस्तपो भूर्भुवः सुवर्ब्रह्मैतदुपास्वैतत्तपः॥-तैत्ति॰ आरण्य॰ प्रपा॰ 10। अनु॰ 8॥



भाष्यम्-इदानीं तपसो लक्षणमुच्यते-(ऋतं॰) यत्तत्त्वं ब्रह्मण एवोपासनं यथार्थज्ञानं च (सत्यं॰) सत्यकथनं सत्यमाचरणं च(श्रुतं॰) सर्वविद्याश्रवणं श्रावणं च (शान्तं॰) अधर्मात् पृथक्कृत्य मनसो धर्मे संस्थापनं मनःशान्तिः (दमस्त॰) इन्द्रियाणां धर्म एव प्रवर्त्तनमधर्मान्निवर्त्तनं च (शमस्त॰) मनसोऽपि निग्रहश्चाधर्माद्धर्मे प्रवर्त्तनं च (दानं त॰) तथा सत्यविद्यादिदानं सदा कर्तव्यम् (यज्ञस्त॰) पूर्वोक्तं यज्ञानुष्ठानं चैतत्सर्वं तपश्शब्देन गृह्यते नान्यदिति। अन्यच्च (भूर्भुव॰) हे मनुष्य! सर्वलोकव्यापकं यद् ब्रह्मास्ति तदेव त्वमुपास्वेदमेव तपो मन्यध्वं नातो विपरीतमिति॥



भाषार्थ-(ऋतं तपः॰) तप इस को कहते हैं कि जो (ऋत) अर्थात् यथार्थ तत्त्व मानने, सत्य बोलने, (श्रुत) अर्थात् सब विद्याओं को सुनने, (शान्त) अर्थात् उत्तम कर्म करने और अच्छे स्वभाव के धारने में सदा प्रवृत्त रहो तथा पूर्वोक्त दम, शम, दान, यज्ञ और प्रेम भक्ति से तीनों लोक में व्यापक ब्रह्म की जो उपासना करना है, उस को भी तप कहते हैं। ऋत आदि का अर्थ प्रथम कर दिया है॥





सत्यं परं परंसत्यं सत्येन न सुवर्गाल्लोकाच्च्यवन्ते कदाचन,सतां हि सत्यं तस्मात् सत्ये रमन्ते। तप इति तपो नानशनात् परं,यद्धि परं तपस्तद् दुर्धर्षं तद् दुराधर्षं तस्मात्तपसि रमन्ते। दम इति नियतं ब्रह्मचारिणस्तस्माद्दमे॰। शम इत्यरण्ये मुनयस्तस्माच्छमे॰। दानमिति सर्वाणि भूतानि प्रशंसन्ति दानान्नातिदुष्करं,तस्माद्दाने॰। धर्म इति धर्मेण सर्वमिदं परिगृहीतं,धर्मान्नातिदुश्चरं तस्माद्धर्मे॰। प्रजन इति भूयांसस्तस्माद् भूयिष्ठाः प्रजायन्ते,तस्माद् भूयिष्ठाः प्रजनने॰। अग्नय इत्याह,तस्मादग्नय आधातव्याः अग्निहोत्रमित्याह,तस्मादग्निहोत्रे॰। यज्ञ इति यज्ञेन हि देवा दिवं गतास्तस्माद्यज्ञे॰। मानसमिति विद्वांसस्त- स्माद्विद्वांस एव मानसे रमन्ते। न्यास इति ब्रह्मा,ब्रह्मा हि परः,परो हि ब्रह्मा,तानि वा एतान्यवराणि तपांसि,न्यास एवात्यरेचयत्। य एवं वेदेत्युपनिषत्।



प्राजापत्यो हाऽऽरुणिः सुपर्णेयः प्रजापतिं पितरमुपससार,किं भगवन्तः परमं वदन्तीति,तस्मै प्रोवाच-सत्येन वायुरावाति,सत्येनाऽदित्यो रोचते दिवि,सत्यं वाचः प्रतिष्ठा,सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितं,तस्मात्सत्यं परमं वदन्ति। तपसा देवा देवतामग्र आयन् तपसर्षयः सुवरन्वविन्दन्,तपसा सपत्नान् प्रणुदामारातीस्तपसि सर्वं प्रतिष्ठितं,तस्मात्तपः पर॰। दमेन दान्ताः किल्विषमवधून्वन्ति,दमेन ब्रह्मचारिणः सुवरगच्छन्,दमो भूतानां दुराधर्षं,दमे सर्वं प्रतिष्ठितं,तस्माद्दमं परमं वदन्ति। शमेन शान्ताः शिवमाचरन्ति शमेन नाकं मुनयोऽन्वविन्दञ्छमो भूतानां दुराधर्षं,शमे सर्वं प्रतिष्ठितं,तस्माच्छमं पर॰। दानं यज्ञानां वरूथं दक्षिणा,लोके दातारं सर्वभूतान्युपजीवन्ति,दानेनारातीरनुपानुदन्त,दानेन द्विषन्तो मित्रा भवन्ति,दाने सर्वं प्रतिष्ठितं,तस्माद्दानं पर॰। धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा,लोके धर्मिष्ठं प्रजा उपसर्पन्ति,धर्मेण पापमपनुदन्ति,धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितं,तस्माद्धर्मं पर॰। प्रजननं वै प्रतिष्ठा,लोके साधु प्रजायास्तन्तुं तन्वानः पितंणामनृणो भवति,तदेव तस्य अनृणं,तस्मात्प्रजननं पर॰।



अग्नयो वै त्रयीविद्या देवयानः पन्था,गार्हपत्य ऋक् पृथिवीरथन्तरमन्वाहार्य्यपचनो यजुरन्तरिक्षं वामदेव्यमाहवनीयः साम सुवर्गो लोको बृहत्तस्मादग्नीन्पर॰। अग्निहोत्रं सायंप्रातर्गृहाणां निष्कृतिः,स्विष्टं सुहुतं,यज्ञक्रतूनां प्रापणं सुवर्गस्य लोकस्य ज्योति- स्तस्मादग्निहोत्रं पर॰। यज्ञ इति यज्ञेन हि देवा दिवं गता,यज्ञेनासुरानपानुदन्त,यज्ञेन द्विषन्तो मित्रा भवन्ति,यज्ञे सर्वं प्रतिष्ठितं,तस्माद्यज्ञं पर॰। मानसं वै प्राजापत्यं पवित्रं,मानसेन मनसा साधु पश्यति,मानसा ऋषयः प्रजा असृजन्त,मानसे सर्वं प्रतिष्ठितं,तस्मान्मानसं परमं वदन्ति॥-तैत्ति॰ आरण्य॰ प्रपा॰ 10। अनु॰ 62।63॥



भाष्यम्-(सत्यं प॰) सत्यभाषाणात् सत्याचरणाच्च परं धर्मलक्षणं किञ्चिन्नास्त्येव। कुतः?सत्येनैव नित्यं मोक्षसुखं संसारसुखं च प्राप्य पुनस्तस्मान्नैव कदापि च्युतिर्भवति। सत्पुरुषाणामपि सत्याचरणमेव लक्षणमस्ति। तस्मात् कारणात् सर्वैर्मनुष्यैः सत्ये खलु रमणीयमिति। तपस्तु ऋतादिधर्मलक्षणानुष्ठानमेव ग्राह्यम्। एवं सम्यग्ब्रह्मचर्य्यसेवनेन विद्याग्रहणं ब्रह्म इत्युच्यते। एवमेव दानादिष्वर्थगतिः कार्य्या। विदुषो लक्षणं मानसो व्यापारः। एवमेव सत्येन ब्रह्मणा वायुरागच्छति। सत्येनादित्यः प्रकाशितो भवति। सत्येनैव मनुष्याणां प्रतिष्ठा जायते नान्यथेति। मानसा ऋषयः प्राणाः विज्ञानादयश्चेति॥



भाषार्थ-(सत्यं परं॰) अब सत्य का स्वरूप दिखाया जाता है कि जिस का ऋत भी नाम





है। सत्यभाषण और आचरण से उत्तम धर्म का लक्षण कोई भी नहीं है, क्योंकि सत्पुरुषों में भी सत्य ही सत्पुरुषपन है। सत्य से ही मनुष्यों को व्यवहार और मुक्ति का उत्तम सुख मिलता है। जिस से छूट के वे दुःख में कभी नहीं गिरते। इसलिए सब मनुष्यों को सत्य में ही रमण करना चाहिए। (तप इति॰) जो अन्याय से किसी के पदार्थ को ग्रहण न करना, जिस का ऋत आदि लक्षण कह चुके हैं, जो अत्यन्त उत्तम और यद्यपि करने में कठिन भी है, तदपि बुद्धिमान् मनुष्य को करना सब सुगम है। इस से तप में नित्य ही निश्चित रहना ठीक है। (दम इति॰) जितेन्द्रिय हो के जो विद्या का अभ्यास और धर्म का आचरण करना है, उस में मनुष्यों को नित्य प्रवृत्त होना चाहिए। (दानमिति॰) दान की स्तुति सब लोग करते हैं, और जिस से कठिन कर्म दूसरा कोई भी नहीं है, जिस से शत्रु भी मित्र हो जाते हैं, इस से दान करने का स्वभाव सब मनुष्यों को नित्य रखना चाहिए।



(धर्म इति॰) जो धर्मलक्षण प्रथम कह आये हैं और जो आगे कहेंगे, वे सब इसी धर्म के हैं क्योंकि जो न्याय अर्थात् पक्षपात को छोड़ के सत्य का आचरण और असत्य का परित्याग करना है, उसी को धर्म कहते हैं। यही धर्म का स्वरूप और सब से उत्तम धर्म है। सब मनुष्यों को इसी में सदा वर्तना चाहिए। (प्रजन इति॰) जिस से मनुष्यों की बढ़ती होती है, जिस में बहुत मनुष्य रमण करते हैं, इस से जन्म को प्रजन कहते हैं। (अग्नय इत्याह॰) तीनों वेद और अग्नि आदि पदार्थों से सब शिल्पविद्या सिद्ध करनी उचित है। (अग्निहोत्रं च॰) अग्निहोत्र से लेके अश्वमेध पर्य्यन्त होम करके सब जगत् का उपकार करने में सदा यत्न करना चाहिए। (मानसमिति॰) जो विचार करने वाले मनुष्य हैं, वे ही विद्वान् होते हैं। इस से विद्वान् लोग विचार ही में सदा रमण करते हैं, क्योंकि मन के विज्ञान आदि गुण हैं वे ही ईश्वर और जीव की सृष्टि के हेतु हैं। इस से मन का बल और उस की शुद्धि करना भी धर्म का उत्तम लक्षण है। (न्यास इति॰) ब्रह्मा बन के, अर्थात् चारों वेदों को जान के, संसारी व्यवहारों को छोड़ के, न्यास अर्थात् संन्यास आश्रम करके जो सब मनुष्यों को सत्यधर्म और सत्यविद्या से लाभ पहुंचाना है, यह भी विद्वान् मनुष्यों को धर्म का लक्षण जान के करना उचित है।



(सत्येन वा॰) सत्य को उत्तम इसलिये कहते हैं कि सत्य जो ब्रह्म है, उस से सब लोगों का प्रकाश और वायु आदि पदार्थों का रक्षण होता है। सत्य से ही सब व्यवहारों में प्रतिष्ठा और परब्रह्म को प्राप्त हो के मुक्ति का सुख भी मिलता है तथा सत्पुरुषों में सत्याचरण ही सत्पुरुषपन है। (तपसा देवा॰) पूर्वोक्त तप से ही विद्वान् लोग परमेश्वर देव को प्राप्त होके, सब काम क्रोध आदि शत्रुओं को जीत के, पापों से अलग होके और ब्रह्मचर्य्य आश्रम का सेवन करके विद्या को प्राप्त होता है, इसलिये धर्म का दम भी श्रेष्ठ लक्षण है। (शमेन॰) शम का लक्षण यह है कि जिस से मनुष्य लोग कल्याण का ही आचरण करते हैं, इस से यह भी धर्म का लक्षण है। (दानेन॰) दान से ही यज्ञ, अर्थात् दाता के आश्रय से सब प्राणियों का जीवन होता है, और दान से ही शत्रुओं को भी जीत कर अपना मित्र कर लेते हैं, इस से दान भी धर्म का लक्षण है। (धर्मो वि॰) सब जगत् की प्रतिष्ठा धर्म ही है धर्मात्मा का ही लोक में विश्वास होता है, धर्म से ही मनुष्य लोग पापों को छुड़ा देते हैं, जितने उत्तम काम हैं वे सब धर्म में ही लिये जाते हैं, इसलिये सब से उत्तम धर्म को ही





जानना चाहिए। (प्रजननं॰) जिस से मनुष्यों का जन्म और प्रजा में वृद्धि होती है और जो परम्परा से ज्ञानियों की सेवा से ऋण अर्थात् बदले का पूरा करना होता है, इससे प्रजनन भी धर्म का हेतु है क्योंकि जो मनुष्यों की उत्पत्ति भी नहीं हो तो धर्म को ही कौन करे। इस कारण से भी धर्म को ही प्रधान जानो।



(अग्नयो वै॰) अर्थात् जिस से तुम लोग साङ्गोपाङ्ग तीनों वेदों को पढ़ो, क्योंकि विद्वानों के ज्ञान-मार्ग को प्राप्त होके पृथिवी, आकाश और स्वर्ग ये तीनों प्रकार की विद्या सिद्ध होती हैं, इस से इन तीनों अग्नि अर्थात् वेदों को श्रेष्ठ कहते हैं। (अग्निहोत्रं) प्रातः, सन्ध्या काल में वायु तथा वृष्टिजल को दुर्गन्ध से छुड़ाके सुगन्धित करने से सब मनुष्यों को स्वर्ग अर्थात् सुख की प्राप्ति होती है, इसलिए अग्निहोत्र को भी धर्म का लक्षण कहते हैं। (यज्ञ इति॰) विद्या से ही विद्वान् लोग स्वर्ग अर्थात् सुख को प्राप्त होते और शत्रुओं को जीत के अपना मित्र कर लेते हैं, इस से विद्या और अध्वर्यु आदि यज्ञ को भी धर्म का लक्षण कहते हैं। (मानसं वै॰) मन के शुद्ध होने से ही विद्वान् लोग प्रजापति अर्थात् परमेश्वर को जान के नित्य सुख को प्राप्त हो सकते हैं। पवित्र मन से सत्य-ज्ञान होता है, और उस में जो विज्ञान आदि ऋषि अर्थात् गुण हैं, उन से परमेश्वर और जीव लोग भी अपनी-अपनी सब प्रजा को उत्पन्न करते हैं अर्थात् परमेश्वर के विद्या आदि गुणों से मनुष्य की प्रजा उत्पन्न होती है। इससे मन को जो पवित्र और विद्यायुक्त करना है, ये भी धर्म के उत्तम लक्षण और साधन हैं। इस से मन के पवित्र होने से सब धर्मकार्य सिद्ध होते हैं। ये सब धर्म के ही लक्षण हैं। इनमें से कुछ तो पूर्व कह दिये और कुछ आगे भी कहेंगे।



सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग् ज्ञानेन ब्रह्मचर्य्येण नित्यम्।



अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः॥1॥



सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः।



येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्॥2॥



-मुण्डकोपनिषदि मु॰ 3। खं॰ 1। मं॰ 5। 6॥



भाष्यम्-अनयोरर्थः-(सत्येन लभ्य॰) सत्येन सत्यधर्माचरणेनैवात्मा परमेश्वरो लभ्यो नान्यथेत्ययं मन्त्रः सुगमार्थः॥1॥



(सत्यमेव॰) सत्यमाचरितमेव जयते,तेनैव मनुष्यः सदा विजयं प्राप्नोति। अनृतेनाधर्माचरणेन पराजयं च। तथा सत्यधर्मेणैव देवयानो विदुषां यः सदानन्दप्रदो मोक्षमार्गोऽस्ति,सोऽपि सत्येनैव विस्तृतः प्रकाशितो भवति। येन च सत्यधर्मानुष्ठानप्रकाशितेन मार्गेणाप्तकामा ऋषयस्तत्राक्रमन्ति गच्छन्ति यत्र सत्यस्य धर्मस्य परमं निधानमधिकरणं ब्रह्म वर्त्तते तत्प्राप्य नित्यानन्दमोक्षप्राप्ता भवन्ति,नान्यथेति। अत एव सत्यधर्मानुष्ठानमधर्मत्यागश्च सर्वैः कर्तव्य इति॥



भाषार्थ-(सत्येन लभ्यस्तपसा॰) अर्थात् जो सत्य आचरणरूप धर्म का अनुष्ठान, ठीक ठीक विज्ञान और ब्रह्मचर्य करते हैं, इन्हीं शुभगुणों से सब का आत्मा परमेश्वर जाना जाता है। जिस को निर्दोष अर्थात् धर्मात्मा ज्ञानी संन्यासी लोग देखते हैं। सो सब के आत्माओं का भी आत्मा, प्रकाशस्वरूप और सब दिन शुद्ध है। उसी की आज्ञापालन करना सब मनुष्यों को चाहिए॥1॥





(सत्यमेव जयते॰) जो सत्य का आचरण करने वाला है, वही मनुष्य सदा विजय और सुख को प्राप्त होता है और जो मिथ्या आचरण अर्थात् झूठे कामों का करने वाला है, वह सदा पराजय और दुःख ही को प्राप्त होता है। विद्वानों का जो मार्ग है, सो भी सत्य के आचरण से ही खुल जाता है। जिस मार्ग से आप्तकाम, धर्मात्मा विद्वान् लोग चल के सत्यसुख को प्राप्त होते हैं, जहां ब्रह्म ही का सत्यस्वरूप सुख सदा प्रकाशित होता है, सत्य से ही उस सुख को वे प्राप्त होते हैं, असत्य से कभी नहीं। इस से सत्यधर्म का आचरण और असत्य का त्याग करना सब मनुष्यों को उचित है॥2॥



भाष्यम्-अन्यच्च-



चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः॥1॥-पू॰ मी॰ अ॰ 1। पा॰ 1। सू॰ 2॥



यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः॥2॥-वैशेषिके अ॰ 1। पा॰ 1। सू॰ 2॥



अनयोरर्थः-(चोदना॰) वेदवाण्या या सत्यधर्माचरणस्य प्रेरणास्ति तयैव सत्यधर्मो लक्ष्यते। योऽनर्थादधर्माचरणाद् बहिरस्त्यतो धर्माख्यां लब्ध्वाऽर्थो भवति। यस्येश्वरेण निषेधः क्रियते सोऽनर्थ-रूपत्वादधर्म्मोऽयमिति ज्ञात्वा सर्वैर्मनुष्यैस्त्याज्य इति॥1॥



(यतोऽभ्यु॰) यस्याचरणादभ्युदयः सांसारिकमिष्टसुखं सम्यक् प्राप्तं भवति,येन च निःश्रेयसं पारमार्थिकं मोक्षसुखं च। स एव धर्मो विज्ञेयः अतो विपरीतो ह्यधर्मश्च। इदमपि वेदानामेव व्याख्यानमस्ति।



इत्यनेकमन्त्रप्रमाण-साक्ष्यादिधर्मोपदेशो वेदेष्वीश्वरेण सर्वमनुष्यार्थमुपदिष्टोऽस्त्येक एवायं सर्वेषां धर्मोऽस्ति,नैव चास्माद् द्वितीयोऽस्तीति वेदितव्यम्॥2॥



॥इति वेदोक्तधर्मविषयः संक्षेपतः समाप्तः॥



भाषार्थ-(चोदना॰) ईश्वर ने वेदों में मनुष्यों के लिए जिस के करने की आज्ञा दी है, वही धर्म और जिस के करने की प्रेरणा नहीं की है, वह अधर्म कहाता है। परन्तु वह धर्म अर्थयुक्त अर्थात् अधर्म का आचरण जो अनर्थ है उस से अलग होता है। इस से धर्म का ही जो आचरण करना है, वही मनुष्यों में मनुष्यपन है॥1॥



(यतोऽभ्यु॰) जिस के आचरण करने से संसार में उत्तम सुख और निःश्रेयस अर्थात् मोक्षसुख की प्राप्ति होती है, उसी का नाम धर्म है। यह भी वेदों की व्याख्या है।



इत्यादि अनेक मन्त्रों के प्रमाणों और ऋषि मुनियों की साक्षियों से यह धर्म का उपदेश किया है कि सब मनुष्यों को इसी धर्म के काम करना उचित है। इस से विदित हुआ कि सब मनुष्यों के लिए धर्म और अधर्म एक ही हैं, दो नहीं। जो कोई इस में भेद करे तो उस को अज्ञानी और मिथ्यावादी ही समझना चाहिए।



॥इति वेदोक्तधर्मविषयः संक्षेपतः॥7॥