अथेश्वरस्तुतिप्रार्थनायाचना-समर्पणोपासनाविद्याविषयः
In Hindi:
संस्कृत में सूत्र की भूमिका : अथेश्वरस्तुतिप्रार्थनायाचना-समर्पणोपासनाविद्याविषयःस्तुतिविषयस्तु यो भूतं चेत्यारभ्योक्तो वक्ष्यते च। अथेदानीं प्रार्थनाविषय उच्यते-
तेजोऽसि तेजो मयि धेहि
वीर्य्यमसि वीर्यं मयि धेहि बलमसि बलं मयि धेहि।
ओजोऽस्योजो मयि धेहि
मन्युरसि मन्युं मयि धेहि सहोऽसि सहो मयि धेहि॥1॥
-य॰ अ॰ 19। मं॰ 9॥
मयीदमिन्द्र इन्द्रियं दधात्वस्मान् रायो मघवा नः सचन्ताम्।
अस्माकं सन्त्वाशिषः सत्या नः सन्त्वाशिषः॥2॥
-य॰ अ॰ 2। मं॰ 10॥
यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते।
तया मामद्य मेधयाग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा॥3॥
-य॰ अ॰ 32। मं॰ 14॥
भाष्यम्-अभि॰-तेजोऽसीत्यादिमन्त्रेषु परमेश्वरस्य स्तुति-प्रार्थनादि-विषयाः प्रकाश्यन्त इति बोध्यम्।
(तेजोऽसि॰) हे परमेश्वर! त्वं तेजोऽस्यनन्त-विद्यादि-गुणैः प्रकाशमयोऽसि,मय्यप्यसंख्यातं तेजोविज्ञानं धेहि। (वीर्य्यमसि॰) हे परमेश्वर! त्वं वीर्यमस्यनन्त-पराक्रमवानसि,कृपया मय्यपि शरीर-बुद्धि-शौर्य्य-स्फूर्त्त्यादिवीर्य्यं पराक्रमं स्थिरं धारय। (बलम॰) हे महाबलेश्वर! त्वमनन्त-बलमसि,मय्यप्यनुग्रहत उत्तमं बलं धेहि स्थापय। (ओजो॰) हे परमेश्वर! त्वमोजोऽसि,मय्यप्योजः सत्यं विद्याबलं धेहि। (मन्युरसि॰) हे परमेश्वर! त्वं मन्युर्दुष्टान् प्रति क्रोधकृदसि,मय्यपि स्वसत्तया दुष्टान् प्रति मन्युं धेहि। (सहोऽसि॰) हे सहनशीलेश्वर! त्वं सहोऽसि,मय्यपि सुख-दुःख-युद्धादि-सहनं धेहि। एवं कृपयैतदादि-शुभान् गुणान् मह्यं देहीत्यर्थः॥1॥
(मयीदमिन्द्र॰) हे इन्द्र परमैश्वर्यवन् परमात्मन्! मयि मदात्मनि श्रोत्रादिकं मनश्च सर्वोत्तमं भवान् दधातु तथाऽस्मांश्च पोषयतु। अर्थात् सर्वोत्तमैः पदार्थैः सह वर्त्तमानानस्मान् सदा कृपया करोतु पालयतु च। (अस्मान् रायो॰) तथा नोऽस्मभ्यं मघं परमं विज्ञानादि-धनं विद्यते यस्मिन् स मघवा भवान् स परमोत्तमं राज्यादि-धनमस्मदर्थं दधातु। (सचन्ताम्) सचतां तत्र चास्मान् समवेतान् करोतु। तथा भवन्त उत्तमेषु गणेषु सचन्तां समवेता भवन्त्वितीश्वराऽऽज्ञास्ति(अस्माकं स॰) तथा हे भगवन्! त्वत्कृपयाऽस्माकं सर्वा आशिष इच्छाः सर्वदा सत्या भवन्तु। मा काश्चिदस्माकं चक्रवर्त्तिराज्यानुशासनादय आशिष इच्छा मोघा भवेयुः॥2॥
(यां मेधां॰) हे अग्ने परमेश्वर! परमोत्तमया मेधया धारणावत्या धिया बुद्ध्या सह (मा) मां मेधाविनं सर्वदा कुरु। का मेधेत्युच्यते-(देवगणाः) विद्वत्समूहाः,पितरो विज्ञानिनश्चोपासते (तया॰) तया मेधया (अद्य) वर्तमानदिने मां सर्वदा युक्तं कुरु
सम्पादय (स्वाहा)-अत्र स्वाहा-शब्दार्थे प्रमाणं निरुक्तकारा आहुः-
स्वाहाकृतयः,स्वाहेत्येतत्सु आहेति वा स्वा वागाहेति वा स्वं प्राहेति वा स्वाहुतं हविर्जुहोतीति वा। तासामेषा भवति॥-निरु॰ अ॰ 8। खं॰ 20॥
स्वाहाशब्दस्यायमर्थः-(सु आहेति वा) सु सुष्ठु कोमलं मधुरं कल्याणकरं प्रियं वचनं सर्वैर्मनुष्यैः सदा वक्तव्यम्।(स्वा वागाहेति वा) या ज्ञानमध्ये स्वकीया वाग्वर्त्तते,सा यदाह तदेव वागिन्द्रियेण सर्वदा वाच्यम्। (स्वं प्राहेति वा) स्वं स्वकीयपदार्थं प्रत्येव स्वत्वं वाच्यं,न परपदार्थं प्रति चेति (स्वाहुतं हविर्जुहोतीति वा) सुष्ठु रीत्या संस्कृत्य संस्कृत्य हविः सदा होतव्यमिति स्वाहाशब्दपर्य्यायार्थाः॥3॥
भाषार्थ-अब गणितविद्याविषय के पश्चात् 'तेजोऽसी'त्यादि मन्त्रों में केवल ईश्वर की प्रार्थना, याचना, समर्पण और उपासना विषय है, सो आगे लिखा जाता है। परन्तु जानना चाहिए कि स्तुतिविषय तो 'यो भूतं च॰' इत्यादि मन्त्रों में कुछ-कुछ लिख दिया है और आगे भी कुछ लिखेंगे। यहां पहले प्रार्थनाविषय लिखते हैं-
(तेजोऽसि॰) अर्थात् हे परमेश्वर! आप प्रकाशरूप हैं, मेरे हृदय में भी कृपा से विज्ञानरूप प्रकाश कीजिए। (वीर्यमसि॰) हे जगदीश्वर! आप अनन्त पराक्रम वाले हैं, मुझ को भी पूर्ण पराक्रम दीजिए। (बलमसि॰) हे अनन्त बलवाले महेश्वर! आप अपने अनुग्रह से मुझ को भी शरीर और आत्मा में पूर्ण बल दीजिए। (ओजो॰) हे सर्वशक्तिमन्! आप सब सामर्थ्य के निवासस्थान हैं, अपनी करुणा से यथोचित सामर्थ्य का निवासस्थान मुझ को भी कीजिये। (मन्युरसि॰) हे दुष्टों पर क्रोध करनेहारे! आप दुष्ट कामों और दुष्ट जीवों पर क्रोध करने का स्वभाव मुझ में भी रखिये। (सहोऽसि॰) हे सब के सहन करनेहारे ईश्वर! आप जैसे पृथिवी आदि लोकों के धारण और नास्तिकों के दुष्टव्यवहारों को सहते हैं, वैसे ही सुख, दुःख, हानि, लाभ, सरदी, गरमी, भूख, प्यास और युद्ध आदि का सहने वाला मुझ को भी कीजिये अर्थात् सब शुभ गुण मुझ को देके अशुभ गुणों से सदा अलग रखिये॥1॥
(मयीदमिन्द्र॰) हे उत्तम ऐश्वर्ययुक्त परमेश्वर! आप अपनी कृपा से श्रोत्र आदि उत्तम इन्द्रिय और श्रेष्ठ स्वभाववाले मन को मुझ में स्थिर कीजिए अर्थात् हम को उत्तम गुण और पदार्थों के सहित सब दिन के लिये कीजिये। (अस्मान् रा॰) हे परमधनवाले ईश्वर! आप उत्तम राज्य आदि धन वाले हम को सदा के लिए कीजिये। (सचन्तां॰) मनुष्यों के लिये ईश्वर की यह आज्ञा है कि हे मनुष्यो! तुम लोग सब काल में सब प्रकार से उत्तम गुणों का ग्रहण और उत्तम ही कर्मों का सेवन सदा करते रहो। (अस्माकं स॰) हे भगवन्! आपकी कृपा से हम लोगों की सब इच्छा सर्वदा सत्य ही होती रहें तथा सदा सत्य ही कर्म करने की इच्छा हो किन्तु चक्रवर्ती राज्य आदि बड़े-बड़े काम करने की योग्यता हमारे बीच में स्थिर कीजिए॥2॥
(यां मेधां॰) इस मन्त्र का यह अभिप्राय है कि- हे परमात्मन्! आप अपनी कृपा से, जो अत्यन्त उत्तम सत्यविद्यादि शुभ गुणों को धारण करने के योग्य बुद्धि है, उस से युक्त हम लोगों को कीजिये कि जिस के प्रताप से देव अर्थात् विद्वान् और पितर अर्थात् ज्ञानी होके हम लोग आप की उपासना सब दिन करते रहें।
(स्वाहा॰) इस शब्द का अर्थ निरुक्तकार यास्कमुनि जी ने अनेक प्रकार से कहा है। सो लिखते हैं कि-
(सु आहेति वा) सब मनुष्यों को अच्छा, मीठा, कल्याण करने वाला और प्रिय वचन सदा बोलना चाहिए। (स्वा वागाहेति वा) अर्थात् मनुष्यों को यह निश्चय करके जानना चाहिए, कि जैसी बात उनके ज्ञान के बीच में वर्त्तमान हो, जीभ से भी सदा वैसा ही बोलें, उस से विपरीत नहीं। (स्वं प्राहेति वा) सब मनुष्य अपने ही पदार्थ को अपना कहें, दूसरे के पदार्थ को कभी नहीं अर्थात् जितना जितना धर्मयुक्त पुरुषार्थ से उन को पदार्थ प्राप्त हो, उतने ही में सदा सन्तोष करें। (स्वाहुतं ह॰) अर्थात् सर्व दिन अच्छी प्रकार सुगन्धादि द्रव्यों का संस्कार करके सब जगत् के उपकार करने वाले होम को किया करें और 'स्वाहा' शब्द का यह भी अर्थ है कि सब दिन मिथ्यावाद को छोड़ के सत्य ही बोलना चाहिए॥3॥
स्थिरा वः सन्त्वायुधा पराणुदे वीळू उत प्रतिष्कभे।
युष्माकमस्तु तविषी पनीयसी मा मर्त्यस्य मायिनः॥4॥
-ऋ॰ अ॰ 1। अ॰ 3। व॰ 18। मं॰ 2॥
इषे पिन्वस्वोजेर्पिन्वस्व ब्रह्मणे पिन्वस्व क्षत्राय पिन्वस्व द्यावापृथिवीभ्यां पिन्वस्व।
धमार्सि सुधर्मामेन्यस्मे नृम्णानि धारय ब्रह्म धारय क्षत्रं धारय विशं धारय॥5॥
-य॰ अ॰ 38। मं॰ 14॥
यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति।
दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिव सङ्कल्पमस्तु॥6॥
-य॰ अ॰ 34। मं॰ 1॥
वाजश्च मे प्रसवश्च मे प्रयतिश्च मे प्रसितिश्च मे धीतिश्च मे क्रतुश्च मे।
भाष्यम्- (स्थिरा वः॰) अभि॰-ईश्वरो जीवेभ्य आशीर्ददातीति विज्ञेयम्-
हे मनुष्या वो युष्माकं (आयुधा) आयुधान्याग्नेयास्त्रादीनि शतघ्नी-भुशुण्डी-धनुर्बाणास्यादीनि शस्त्राणि च (स्थिरा) स्थिराणि मदनुग्रहेण सन्तु। (पराणुदे) दुष्टानां शत्रूणां पराजयाय युष्माकं विजयाय च सन्तु। तथा (वीळू) अत्यन्तदृढानि प्रशंसितानि च। (उत) एवं शत्रुसेनाया अपि (प्रतिष्कभे) प्रतिष्टम्भनाय पराङ्मुखतया पराजयकरणाय च सन्तु। तथा (युष्माकमस्तु तविषी॰) युष्माकं तविषी सेनाऽत्यन्तप्रशंसनीया बलं चास्तु येन युष्माकं चक्रवर्तिराज्यं स्थिरं स्याद् दुष्टकर्मकारिणां युष्मद्विरोधिनां शत्रूणां पराजयश्च सदा भवेत् (मा मर्त्यस्य मा॰) परन्त्वयमाशीर्वादः सत्यकर्मानुष्ठानिभ्यो हि ददामि,किन्तु मायिनोऽन्यायकारिणो मर्त्यस्य मनुष्यस्य च कदाचिन् मास्तु। अर्थान्नैव दुष्टकर्मकारिभ्यो मनुष्येभ्योऽहमाशीर्वादं कदाचिद्ददामीत्यभिप्रायः॥4॥
(इषे पिन्वस्व॰) हे भगवन्! इषे उत्तमेच्छायै,परमोत्कृष्टायान्नाय चास्मान् त्वं पिन्वस्व स्वतन्त्रतया सदैव पुष्टिमतः प्रसन्नान् कुरु (ऊर्जे) वेदविद्या-विज्ञान-ग्रहणाय परम-प्रयत्नकारिणो ब्राह्मणवर्ण-योग्यान् कृत्वा सदा पिन्वस्व दृढोत्साह-युक्तानस्मान् कुरु।(क्षत्रा॰) क्षत्राय साम्राज्याय पिन्वस्व,परमवीरतः क्षत्रिय-स्वभावयुक्तान् चक्रवर्त्ति-राज्य-सहितानस्मान् कुरु (द्यावापृ॰) एवं यथा द्यावापृथिवीभ्यां सूर्य्याग्नि-भूम्यादिभ्यः पदार्थेभ्यः सर्वजगते प्रकाशोपकारौ भवतः तथैव कला-कौशल-यानचालनादि-विद्यां गृहीत्वा सर्वमनुष्योपकारं
वयं कुर्मः,एतदर्थमस्मान् पिन्वस्वोत्तम-प्रयत्नवतः कुरु। (धर्मासि॰) हे सुधर्म परमेश्वर! त्वं धर्मासि न्यायकार्यसि अस्मानपि न्यायधर्म-युक्तान् कुरु।(अमेनि॰) हे सर्वहितकारकेश्वर! यथा त्वममेनिर्निर्वैरोऽसि तथाऽस्मानपि सर्वमित्रान्निर्वैरान् कुरु। तथा (अस्मे) अस्मदर्थं (नृम्णानि) कृपया सुराज्यसुनियम-सुरत्नादीनि धारय,एवमेवास्माकं (ब्रह्म॰) वेदविद्यां ब्राह्मणवर्णं च धारय (क्षत्रं॰) राज्यं क्षत्रियवर्णं च धारय (विशं॰) वैश्यवर्णं प्रजां च धारय। अर्थात् सर्वोत्तमान् गुणानस्मन्निष्ठान् कुर्विति प्रार्थ्यते याच्यते च भवान्। तस्मात् सर्वामस्मदिच्छां सम्पूर्णां सम्पादयेति॥5॥
(यज्जाग्रतो दू॰) यन् मनो जाग्रतो मनुष्यस्य दूरमुदैति सर्वेषामिन्द्रियाणामुपरि वर्त्तमानत्वादधिष्ठातृत्वेन व्याप्नोति (दैवम्) ज्ञानादि-दिव्यगुणयुक्तं (तदु॰) तत् उ इति वितर्के,सुप्तस्य पुरुषस्य (तथैव) तेनैव प्रकारेण स्वप्ने दिव्यपदार्थद्रष्टृ (एति) प्राप्नोति एवं सुषुप्तौ च दिव्यानन्दयुक्ततां चैति तथा (दूरङ्गमम्) अर्थाद् दूरगमनशीलमस्ति(ज्योतिषां ज्योति॰) ज्योतिषामिन्द्रियाणां सूर्यादीनां च ज्योतिः सर्वपदार्थप्रकाशकम् (एकम्) असहायं यन्मनोऽस्ति,हे ईश्वर! भवत्कृपया (तन्मे॰) तन् मे मम मनो मननशीलं सत् शिवसङ्कल्पं कल्याणेष्टधर्म-शुभगुणप्रियमस्तु॥6॥
एवमेव'वाजश्च म'इत्यष्टादशाध्यायस्थैर्मन्त्रैः सर्वस्वसमर्पणं परमेश्वराय कर्त्तव्यमिति वेदे विहितम्। अतः परमोत्तमपदार्थं मोक्षमारभ्यान्न-पानादिपर्य्यन्त-मीश्वराद्याचितव्यमिति सिद्धम्।
भाषार्थ- (स्थिरा वः॰) इस मन्त्र में ईश्वर सब जीवों को आशीर्वाद देता है कि- हे मनुष्यो! तुम लोग सब काल में उत्तम बल वाले हो। किन्तु तुम्हारे (आयुधा) अर्थात् आग्नेयादि अस्त्र और (शतघ्नी) तोप (भुशुण्डी) बन्दूक, धनुष, बाण और तलवार आदि शस्त्र सब स्थिर हों तथा (पराणुदे) मेरी कृपा से तुम्हारे अस्त्र और शस्त्र सब दुष्ट शत्रुओं के पराजय करने के योग्य होवें। (वीळू) तथा वे अत्यन्त दृढ़ और प्रशंसा करने के योग्य होवें (उत प्रतिष्कभे॰) अर्थात् तुम्हारे अस्त्र और शस्त्र सब दुष्ट शत्रुओं की सेना के वेग थांभने के लिये प्रबल हों तथा (युष्माकमस्तु त॰) हे मनुष्यो! तुम्हारी (तविषी॰) अर्थात् सेना अत्यन्त प्रशंसा के योग्य हो। जिस से तुम्हारा अखण्डित बल और चक्रवर्ति राज्य स्थिर होकर दुष्ट शत्रुओं का सदा पराजय होता रहे (मा मर्त्यस्य॰) परन्तु यह मेरा आशीर्वाद केवल धर्मात्मा, न्यायकारी और श्रेष्ठ मनुष्यों के लिये है और जो (मायिनः) अर्थात् कपटी, छली, अन्यायकारी और दुष्ट मनुष्य है उस के लिये नहीं किन्तु ऐसे मनुष्यों का तो
सदा पराजय ही होता रहेगा। इसलिये तुम लोग सदा धर्म कार्यों ही को करते रहो॥4॥
(इषे पिन्वस्व) हे भगवन्! (इषे॰) हमारी शुभ कर्म करने ही की इच्छा हो और हमारे शरीरों को उत्तम अन्न से सदा पुष्टियुक्त रखिये (ऊर्जे॰) अर्थात् अपनी कृपा से हम को सदा उत्तम पराक्रमयुक्त और दृढ़ प्रयत्न वाले कीजिये (ब्रह्मणे॰) सत्यशास्त्र अर्थात् वेदविद्या के पढ़ने पढ़ाने और उस से यथावत् उपकार लेने में हम को अत्यन्त समर्थ कीजिए अर्थात् जिससे हम लोग उत्तम विद्यादि गुणों और कर्मों को करके ब्राह्मणवर्ण हों (क्षत्राय॰) हे परमेश्वर! आपके अनुग्रह से हम लोग चक्रवर्तिराज्य और शूरवीर पुरुषों की सेना से युक्त हों कि क्षत्रियवर्ण के अधिकारी हम को कीजिये (द्यावापृ॰) जैसे पृथिवी, सूर्य, अग्नि, जल और वायु आदि पदार्थों से सब जगत् का प्रकाश और उपकार होता है, वैसे ही कला कौशल, विमान आदि यान चलाने के लिये हम को
उत्तम सुखसहित कीजिये कि जिस से हम लोग सब सृष्टि के उपकार करने वाले हों (धर्मासि॰) हे सुधर्मन् न्यायकरनेहारे ईश्वर! आप न्यायकारी हैं, वैसे हम को भी न्यायकारी कीजिये (अमे॰) हे भगवन्! जैसे आप निर्वैर होके सब से वर्त्तते हो, वैसे ही सब से वैररहित हम को भी कीजिये (अस्मे) हे परमकारुणिक! हमारे लिये (नृम्णानि) उत्तम राज्य, उत्तम धन और शुभ गुण दीजिये। (ब्रह्म॰) हे परमेश्वर! आप ब्राह्मणों को हमारे बीच में उत्तमविद्यायुक्त कीजिये (क्षत्रं॰) हम को अत्यन्त चतुर, शूरवीर और क्षत्रियवर्ण का अधिकारी कीजिये (विशं॰) अर्थात् वैश्यवर्ण और हमारी प्रजा का रक्षण सदा कीजिये कि जिस से हम शुभ गुण वाले होकर अत्यन्त पुरुषार्थी हों॥5॥
(यज्जाग्रतो॰) हे सर्वव्यापक जगदीश्वर! जैसे जाग्रत अवस्था में मेरा मन दूर-दूर घूमने वाला, सब इन्द्रियों का स्वामी तथा (दैवं॰) ज्ञान आदि दिव्यगुण वाला और प्रकाशस्वरूप रहता है, वैसे ही (तदु सु॰) निद्रा अवस्था में भी शुद्ध और आनन्दयुक्त रहे।(ज्योतिषां॰) जो प्रकाश का भी प्रकाश करने वाला और एक है।(तन्मे॰) हे परमेश्वर! ऐसा जो मेरा मन है सो आपकी कृपा से (शिवसं॰) कल्याण करने वाला और शुद्धस्वभावयुक्त हो। जिस से अधर्म कामों में कभी प्रवृत्त न हों॥6॥
इसी प्रकार से (वाजश्च मे॰) इत्यादि मन्त्र शुक्ल यजुर्वेद के अठारहवें अध्याय में मन्त्र ईश्वर के अर्थ सर्वस्व समर्पण करने के ही विधान में हैं अर्थात् सब से उत्तम मोक्षसुख से लेके अन्न, जल पर्यन्त सब पदार्थों की याचना मनुष्यों को केवल ईश्वर ही से करनी चाहिए।
आयुर्यज्ञेन कल्पतां प्राणो यज्ञेन कल्पतां चक्षुर्यज्ञेन कल्पतां श्रोत्रं यज्ञेन कल्पतां वाग्यज्ञेन कल्पतां मनो यज्ञेन कल्पतामात्मा यज्ञेन कल्पतां ब्रह्मा यज्ञेन कल्पतां ज्योतिर्यज्ञेन कल्पतां स्वर्यज्ञेन कल्पतां पृष्ठं यज्ञेन कल्पतां यज्ञो यज्ञेन कल्पताम्। स्तोमश्च यजुश्च ऋक् च साम च बृहच्च रथन्तरं च। स्वर्देवा अगन्मामृता अभूम प्रजापतेः प्रजा अभूम वेट् स्वाहा॥7॥
-य॰ अ॰ 18। मं॰ 29॥
भाष्यम्- (आयुर्यज्ञेन॰) यज्ञो वै विष्णुः॥ श॰ 1।1।2।13
वेवेष्टि व्याप्नोति सर्वं जगत् स विष्णुरीश्वरः। हे मनुष्यास्तेन यज्ञेनेश्वरप्राप्त्यर्थं सर्वं स्वकीयम् आयुः कल्पतामिति। यदस्मदीयमायुरस्ति तदीश्वरेण कल्पतां परमेश्वराय समर्पितं भवतु। एवमेव (प्राणः) (चक्षुः) (श्रोत्रं)(वाक्) वाणी (मनः) मननं ज्ञानम् (आत्मा) जीवः (ब्रह्मा) चतुर्वेदज्ञाता यज्ञानुष्ठानकर्त्ता,(ज्योतिः) सूर्यादिप्रकाशः (धर्मः) न्यायः(स्वः) सुखं (पृष्ठं) भूम्याद्यधिकरणं (यज्ञो॰) अश्वमेधादिः शिल्पक्रियामयो वा(स्तोमः) स्तुतिसमूहः (यजुः) यजुर्वेदाध्ययनम् (ऋक्) ऋग्वेदाध्ययनम् (साम) सामवेदाध्ययनम् चकारादथर्व-वेदाध्ययनं च (बृहच्च रथन्तरं च) महत्क्रियासिद्धि-फलभोगः शिल्पविद्याजन्यं वस्तु चास्मदीयमेतत्सर्वं परमेश्वराय समर्पितमस्तु येन वयं कृतज्ञाः स्याम। एवं कृते परमकारुणिकः परमेश्वरः सर्वोत्तमं सुखमस्मभ्यं दद्यात्। येन वयं (स्वर्देवा) सुखे प्रकाशिताः (अमृता) परमानन्दम्मोक्षं (अगन्म) सर्वदा प्राप्ताः भवेम। तथा (प्रजापतेः प्र॰) वयं परमेश्वरस्यैव प्रजा (अभूम) अर्थात् परमेश्वरं विहायान्यमनुष्यं राजानं नैव कदाचिन्मन्यामह इति। एवं
जाते (वेट् स्वाहा॰) सदा वयं सत्यं वदामो भवदाज्ञाकरणे परमप्रयत्नत उत्साहवन्तोऽभूम भवेम। मा कदाचिद्भवदाज्ञाविरोधिनो वयमभूम,किन्तु भवत्सेवायां सदैव पुत्रवद्वर्त्तेमहि॥7॥
भाषार्थ- (आयुर्यज्ञेन॰) यज्ञ नाम विष्णु का है जो कि सब जगत् में व्यापक हो रहा है। उसी परमेश्वर के अर्थ सब चीज समर्पण कर देना चाहिये। इस विषय में यह मन्त्र है कि सब मनुष्य अपनी आयु को ईश्वर की सेवा और उस की आज्ञापालन में समर्पित करें। (प्राणो॰) अर्थात् अपना प्राण भी ईश्वर के अर्थ कर देवें। (चक्षु॰) जो प्रत्यक्ष प्रमाण और आंख, (श्रोत्रं॰) जो श्रवण विद्या और शब्दप्रमाणादि, (वाक्॰) वाणी, (मनो॰) मन और विज्ञान, (आत्मा॰) जीव, (ब्रह्मा॰) तथा चारों वेद को पढ़ के जो पुरुषार्थ किया है, (ज्योतिः॰) जो प्रकाश, (स्वर्यं॰) जो सब सुख, (पृष्ठं॰) जो उत्तम कर्मों का फल और स्थान, (यज्ञो॰) जो कि पूर्वोक्त तीन प्रकार का यज्ञ किया जाता है, ये सब ईश्वर की प्रसन्नता के अर्थ समर्पित कर देना अवश्य है। (स्तोमश्च॰) जो स्तुति का समूह, (यजुश्च॰) सब क्रियाओं की विद्या, (ऋक् च॰) ऋग्वेद अर्थात् स्तुति स्तोत्र, (साम च॰) सब गान करने की विद्या, (चकारात्॰) चकार से अथर्ववेद (बृहच्च) बड़े बड़े सब पदार्थ और (रथन्तरं च) शिल्पविद्या आदि के फलों में से जो जो फल अपने आधीन हों, वे सब परमेश्वर के समर्पण कर देवें। क्योंकि सब वस्तु ईश्वर ही की बनाई हैं।
इस प्रकार से जो मनुष्य अपनी सब चीजें परमेश्वर के अर्थ समर्पित कर देता है, उसके लिये परमकारुणिक परमात्मा सब सुख देता है, इस में सन्देह नहीं। (स्वर्देवा॰) अर्थात् परमात्मा की कृपा की लहर और परमप्रकाशरूप विज्ञानप्राप्ति में शुद्ध होके तथा सब संसार के बीच में कीर्तिमान् होके हम लोग परमानन्दस्वरूप मोक्षसुख को (अगन्म) सब दिन के लिये प्राप्त हों (प्रजापतेः॰) तथा हम सब मनुष्य लोगों को उचित है कि किसी एक मनुष्य को अपना राजा न मानें, क्योंकि ऐसा अभागी कौन मनुष्य है कि जो सर्वज्ञ, न्यायकारी, सब के पिता एक परमेश्वर को छोड़ के दूसरे की उपासना करे और राजा माने। इसलिये हम लोग उसी को अपना राजा मान के सत्य न्याय को प्राप्त हों अर्थात् वही सब मनुष्यों के न्याय करने में समर्थ है, अन्य कोई नहीं। (वेट् स्वाहा) अर्थात् हम लोग सर्वज्ञ, सत्यस्वरूप, सत्यन्याय करने वाले परमेश्वर राजा की अपने सत्यभाव से प्रजा हो के यथावत् सत्य मानने, सत्य बोलने और सत्य करने में समर्थ होवें। सब मनुष्यों को परमेश्वर से इस प्रकार की आशा करनी उचित है कि हे कृपानिधे! आप की आज्ञा और भक्ति से हम लोग परस्पर विरोधी कभी न हों, किन्तु आप और सब के साथ सदा पिता पुत्र के समान प्रेम से वर्त्तें॥7॥
॥इतीश्वर-स्तुति-प्रार्थना-याचना-समर्पणोपासना-विद्याविषयः॥13॥