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Yajurveda / 13 / 15

भुवो॑ य॒ज्ञस्य॒ रज॑सश्च ने॒ता यत्रा॑ नि॒युद्भिः॒ सच॑से शि॒वाभिः॑। दि॒वि मू॒र्द्धानं॑ दधिषे स्व॒र्षां जि॒ह्वाम॑ग्ने चकृषे हव्य॒वाह॑म्॥१५॥

Veda : Yajurveda | Chapter : 13 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : त्रिशिराः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृदार्षी त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह कैसा हो इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

पदपाठ : भुवः॑। य॒ज्ञस्य॑। रज॑सः। च॒। ने॒ता। यत्र॑। नि॒युद्भि॒रिति॑ नि॒युत्ऽभिः॑। सच॑से। शि॒वाभिः॑। दि॒वि। मू॒र्द्धान॑म्। द॒धि॒षे॒। स्व॒र्षाम्। स्वः॒सामिति॑ स्वः॒ऽसाम्। जि॒ह्वाम्। अ॒ग्ने॒। च॒कृ॒षे॒। ह॒व्य॒वाह॒मिति॑ हव्य॒ऽवाह॑म्॥१५॥

पदार्थ : हे (अग्ने) विद्वान् पुरुष! (यत्र) जिस राज्य में आप जैसे (नियुद्भिः) वेग आदि गुणों के साथ वायु (रजसः) लोकों वा ऐश्वर्य्य का (नेता) चलाने हारा (दिवि) न्याय के प्रकाश में (मूर्द्धानम्) शिर को धारण करता है, वैसे (यत्र) जहां (शिवाभिः) कल्याणकारक नीतियों के साथ (भुवः) अपनी पृथिवी के (यज्ञस्य) राजधर्म्म के पालन करनेहारे होके (सचसे) संयुक्त होता, अच्छे पुरुषों से राज्य को (दधिषे) धारण और (हव्यवाहम्) देने योग्य विद्वानों की प्राप्ति का हेतु (स्वर्षाम्) सुखों का सेवन करानेहारी (जिह्वाम्) अच्छे विषयों की ग्राहक वाणी को (चकृषे) करते हो, वहाँ सब सुख बढ़ते हैं, यह निश्चित जानिये॥१५॥

भावार्थ : जिस राज्य में राजा आदि सब राजपुरुष मंगलाचरण करनेहारे धर्मात्मा होके धर्मानुकूल प्रजाओं का पालन करें, वहां विद्या और अच्छी शिक्षा से होने वाले सुख क्यों न बढ़ें॥१५॥