Yajurveda / 13 / 16
ध्रु॒वासि॑ ध॒रुणास्तृ॑ता वि॒श्वक॑र्मणा। मा त्वा॑ समु॒द्रऽ उद्व॑धी॒न्मा सु॑प॒र्णोऽअव्य॑थमाना पृथि॒वीं दृ॑ꣳह॥१६॥
Veda : Yajurveda | Chapter : 13 | Mantra No : 16
Seer : trishiraaH | Devta : agniH | Metre : svaraaDaarShyanuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation under process. Will be uploaded Shortly.
Verse : dhruvaasi dharuNaastRRitaa vishvakarmaNaa. maa tvaa samudra.a udvadhiinmaa suparNo.aavyathamaanaa pRRithivii.m dRRi.nha .16 .
Component Words : dhruvaa. asi. dharuNaa. aastRRitetyaa.astRRitaa. vishvakarmaNeti vishva.akarmaNaa. maa. tvaa. samudraH. ut. vadhiit. maa. suparNa iti su.aparNaH. avyathamaanaa. pRRithiviim. dRRi.nha .16 .
In Hindi:
ऋषि : त्रिशिराः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराडार्ष्यनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : फिर वह राजपत्नी कैसी होवे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥
पदपाठ : ध्रु॒वा। अ॒सि॒। ध॒रुणा॑। आस्तृ॒तेत्याऽस्तृ॑ता। वि॒श्वक॑र्म॒णेति॑ वि॒श्वऽक॑र्मणा। मा। त्वा॒। स॒मु॒द्रः। उत्। व॒धी॒त्। मा। सु॒प॒र्ण इति॑ सुऽप॒र्णः। अव्य॑थमाना। पृ॒थि॒वीम्। दृ॒ꣳह॒॥१६॥
पदार्थ : हे राजा की स्त्री! जिस कारण (विश्वकर्मणा) सब धर्मयुक्त काम करने वाले अपने पति के साथ वर्त्तती हुई (आस्तृता) वस्त्र, आभूषण और श्रेष्ठ गुणों से ढपी हुई (धरुणा) विद्या और धर्म की धारणा करनेहारी (ध्रुवा) निश्चल (असि) है, सो तू (अव्यथमाना) पीड़ा से रहित हुई (पृथिवीम्) अपनी राज्यभूमि को (उद्दृंह) अच्छे प्रकार बढ़ा (त्वा) तुझ को (समुद्रः) जार लोगों का व्यवहार (मा) मत (वधीत्) सतावे और (सुपर्णः) सुन्दर रक्षा किये अवयवों से युक्त तेरा पति (मा) नहीं मारे॥१६॥
भावार्थ : जैसी राजनीति विद्या को राजा पढ़ा हो, वैसी ही उसकी राणी भी पढ़ी होनी चाहिये। सदैव दोनों परस्पर पतिव्रता, स्त्रीव्रत हो के न्याय से पालन करें। व्यभिचार और काम की व्यथा से रहित होकर धर्मानुकूल पुत्रों को उत्पन्न करके स्त्रियों का स्त्री राणी और पुरुषों का पुरुष राजा न्याय करे॥१६॥
In Sanskrit:
ऋषि : त्रिशिराः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराडार्ष्यनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय : पुनः सा कीदृशी भवेदित्याह॥
पदपाठ : ध्रु॒वा। अ॒सि॒। ध॒रुणा॑। आस्तृ॒तेत्याऽस्तृ॑ता। वि॒श्वक॑र्म॒णेति॑ वि॒श्वऽक॑र्मणा। मा। त्वा॒। स॒मु॒द्रः। उत्। व॒धी॒त्। मा। सु॒प॒र्ण इति॑ सुऽप॒र्णः। अव्य॑थमाना। पृ॒थि॒वीम्। दृ॒ꣳह॒॥१६॥
पदार्थ : (ध्रुवा) निष्कम्पा (असि) (धरुणा) विद्याधर्मधर्त्री (आस्तृता) वस्त्रालङ्कारशुभगुणैः सम्यगाच्छादिता (विश्वकर्मणा) विश्वानि समग्राणि धर्म्यकर्माणि यस्य पत्युस्तेन (मा) (त्वा) त्वाम् (समुद्रः) समुद्द्रवन्ति कामुका यस्मिन् व्यवहारे सः (उत्) (वधीत्) हन्यात् (मा) (सुपर्णः) शोभनानि पर्णानि पालितान्यङ्गानि यस्य सः (अव्यथमाना) पीडामप्राप्ता (पृथिवीम्) स्वराज्यभूमिम् (दृꣳह) वर्धय। [अयं मन्त्रः शत॰७.४.२.५ व्याख्यातः]॥१६॥
अन्वय : हे राजपत्नि! यतो विश्वकर्मणा पत्या सह वर्त्तमानाऽऽस्तृता धरुणा ध्रुवाऽसि, साऽव्यथमाना सती त्वं पृथिवीमुद्दृंह त्वा समुद्रो मावधीत्, सुपर्णश्च मा वधीत्॥१६॥
भावार्थ : यादृशीं राजनीतिविद्यां राजाऽधीतवान् भवेत्, तादृशीमेव राज्ञ्यप्यधीतवती स्यात्। सदैवोभौ पतिव्रतास्त्रीव्रतौ भूत्वा न्यायेन पालनं कुर्य्याताम्। व्यभिचारकामव्यथारहितौ भूत्वा धर्मेण सन्तानानुत्पाद्य स्त्रीन्यायं स्त्री पुरुषन्यायं पुरुषश्च कुर्य्यात्।॥१६॥