Atharvaveda / 2 / 4 / 4
दे॒वैर्द॒त्तेन॑ म॒णिना॑ जङ्गि॒डेन॑ मयो॒भुवा॑। विष्क॑न्धं॒ सर्वा॒ रक्षां॑सि व्याया॒मे स॑हामहे ॥ 4॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 4 | Paryay : | Mantra No : 4
In English:
Seer : atharvaa | Devta : chandramaa athavaa ja~NgiDaH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : devairdattena maNinaa ja~NgiDena mayobhuvaa. viShkandha.m sarvaa rakShaa.msi vyaayaame sahaamahe . 4.
Component Words : devaiH . dattena . maNinaa . ja~NgiDena . mayaHbhuvaa . vi.askandham . sarvaa . rakShaa.msi . vi.aaayaame . sahaamahe .4.4.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : चन्द्रमा अथवा जङ्गिडः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : मनुष्य परमेश्वर की भक्ति से आयु बढ़ावे।
पदपाठ : दे॒वै: । द॒त्तेन॑ । म॒णिना॑ । ज॒ङ्गि॒डेन॑ । म॒य॒:भुवा॑ । विऽस्क॑न्धम् । सर्वा॑ । रक्षां॑सि । वि॒ऽआ॒या॒मे । स॒हा॒म॒हे॒ ॥४.४॥
पदार्थ : (देवैः) विद्वानों के (दत्तेन) दिये हुए [उपदेश किये हुए] (मणिना) मणि [अति श्रेष्ठ], (मयोभुवा) आनन्द के देनेहारे (जङ्गिडेन) रोगों के भक्षक [परमेश्वर वा औषध] द्वारा (विष्कन्धम्) विघ्न और (सर्वा=सर्वाणि) सब (रक्षांसि) राक्षसों को (व्यायामे) संग्राम में (सहामहे) हम दबावें ॥४॥"
भावार्थ : मनुष्यों को योग्य है कि विद्वानों के सत्सङ्ग से दुःखनाशक परमेश्वर के उपकारों पर दृष्टि करके पुरुषार्थ के साथ पथ्य द्रव्यों का सेवन करके विघ्नकारी दुष्ट जीवों, पापों और रोगों को हटाकर सदा आनन्द में रहें ॥४॥
टिप्पणी :४–देवैः। विद्वद्भिः। दत्तेन। दीयते इति। दा–क्त। कृतदानेन। उपदिष्टेन। मयोभुवा। अ० १।५।१। सुखस्य भावयित्रा, उत्पादकेन। व्यायामे। वि+आङ्+यम परिवेषणे–घञ्। मल्ल क्रीडाप्रदेशे। संग्रामे। सहामहे। अभिभवामः। अन्यद् व्याख्यातम्, म० १ ॥