Atharvaveda / 2 / 5 / 5
इन्द्र॑स्य॒ नु प्रा वो॑चं वी॒र्या॑णि॒ यानि॑ च॒कार॑ प्रथ॒मानि॑ व॒ज्री। अह॒न्नहि॒मन्व॒पस्त॑तर्द॒ प्र व॒क्षणा॑ अभिन॒त्पर्व॑तानाम् ॥ 5॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 5 | Paryay : | Mantra No : 5
In English:
Seer : bhRRiguraatharvaNaH | Devta : indraH | Metre : triShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : indrasya nu praa vocha.m viiryaaNi yaani chakaara prathamaani vajrii. ahannahimanvapastatarda pra vakShaNaa abhinatparvataanaam . 5.
Component Words : indrasya . nu . pra . vocham . viiryaa᳡Ni . yaani . chakaara . prathamaani . vajrii . ahan . ahim . anu . apaH . tatarda . pra . vakShaNaaH . abhinat . parvataanaam .5.5.
In Hindi:
ऋषि : भृगुराथर्वणः | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :
विषय : मनुष्य सदैव उन्नति का उपाय करता रहे।
पदपाठ : इन्द्र॑स्य॒ । नु । प्र । वो॒च॒म् । वी॒र्या᳡णि । यानि॑ । च॒कार॑ । प्र॒थ॒मानि॑ । व॒ज्री । अह॑न् । अहि॑म् । अनु॑ । अ॒प: । त॒त॒र्द॒ । प्र । व॒क्षणा॑: । अ॒भि॒न॒त् । पर्व॑तानाम् ॥५.५॥
पदार्थ : (इन्द्रस्य) परम ऐश्वर्यवाले पुरुष के (वीर्याणि) पराक्रमों को (नु) शीघ्र (प्र) अच्छे प्रकार (वोचम्) मैं कहूँ, (यानि) जिन (प्रथमानि) प्रसिद्ध, अथवा प्रथम श्रेणी के अति श्रेष्ठ कर्मों को (वज्री) उस वज्रधारी पुरुष ने (चकार) किया था। [अर्थात्] (अहिम्) सर्प के समान [हनन करनेवाले], अथवा, बादल के समान [प्रकाश रोकनेवाले] हिंसकजन को (अहन्) उसने मार डाला, (अनु) अनुक्रम से (अपः) [उस दुष्ट के] कर्म का (ततर्द) अपमान किया और (पर्वतानाम्) मेघों के समान [अन्धकार से छाये हुए], अथवा पहाड़ों के समान [दृढ़ स्वभाववाले] दुराचारियों की, अथवा पहाड़ों में गुप्त (वक्षणाः) रुष्ट वा क्रुद्ध सेनाओं को (प्र) सर्वथा (अभिनत्) छिन्न-भिन्न कर दिया ॥५॥"
भावार्थ : मनुष्य पूर्वकालीन (इन्द्र) प्रतापी और (वज्री) तेजस्वी नीतिकुशल पुरुषों का यश कीर्तन इतिहास द्वारा करें और उनका अनुकरण करके कुरीतियों के त्याग और सुरीतियों के प्रचार से आनन्द भोगें ॥५॥ मन्त्र ५–७ ऋग्वेद में हैं–मं० १ सू० ३२ म० १–३ ॥ (प्रा) के स्थान पर ऋग्वेद में (प्र) है। ईसाइयों की नवीन धर्मपुस्तक (New Testament) मत्ती, पर्व १२ वाक्य ३४ में “साँप”–बुरे पुरुष के लिये आया है। “हे सापों के वंश ! तुम बुरे होके अच्छी बातें क्योंकर कह सकते हो, क्योंकि जो मन में भरा है, उसी को मुँह से बोलता है” ॥
टिप्पणी :५–इन्द्रस्य। ऐश्वर्यवतः पुरुषस्य। नु। क्षिप्रम्–निघ० २।१५। प्रा। निपातस्य च। पा० ६।३।१३६। इति दीर्घः। ऋग्वेदे तु (प्र) इति पाठः। प्रकर्षेण। वोचम्। वच्, वा ब्रूञ् व्यक्तायां वाचि। आशीर्लिङि छान्दसं रूपम्। अहम् उच्यासम्। वीर्याणि। अ० १।७।५। वीरकर्माणि। पराक्रमान्। प्रथमानि। अ० १।१२।१। प्रथितानि। प्रख्यातानि। सुप्रसिद्धानि। अन्यैः पूर्वकृतानि। वज्री। ऋज्रेन्द्राग्रवज्र०। उ० २।२८। इति वज गतौ–रन् प्रत्ययान्तो निपात्यते। अत इनिठनौ। पा० ५।२।११५। इति वज्र–इनि। वज्रविशिष्टः। कुलिशयुक्तः। दण्डवान्। अहन्। हन हिंसागत्योः–लङ्। हतवान्। अहिम्। आङि श्रिहनिभ्यां ह्रस्वश्च। उ० ४।१३८। इति आङ्+हन हिंसागत्योः–इण्, स च डित्। आङो ह्रस्वत्वम्। धार्मिकाणाम्। आहन्तारम्। सर्पम्। सर्पवत् क्लेशप्रदम्। अहिः, मेघनाम–निघ० १।१०। मेघवत् प्रकाशनिरोधकं पुरुषम्। अनु। अनुक्रमेण। अपः। आपः कर्माख्यायां ह्रस्वो नुट् च वा।। उ० ४।२०८। इति आप्लृ व्याप्तौ–असुन्। कर्मनाम–निघ० ३।१। तस्य अहेर्दृष्टकर्म, इत्यर्थः। ततर्द। उतृदिर् हिंसानादरयोः–लिट्। जिहिंस। अनादृतवान्। तिरस्कृतवान्। वक्षणाः। क्रुधमण्डार्थेभ्यश्च। पा० ३।२।१५१। इति वक्ष रोषे–युच्। चित्स्वरं बाधित्वा प्रत्ययस्वरः। रुष्टाः क्रुद्धाः सेनाः। प्र–अभिनत्। भिदिर् विदारणे–लङ्। भिन्नवान्। विदारितवान्। पर्वतानाम्। भृमृदृशियजिपर्वि०। उ० ३।११०। इति पर्व पूरणे–अतच्। पर्वति पूरयतीति पर्वतः। यद्वा, स्नामदिपद्यर्त्तिपॄशकिभ्यो वनिप्। उ० ४।११३। इति पॄ पालनपूरणयोः–वनिप्। पृणन्ति पालयन्ति अवयविनमिति पर्वाणि। तन् पर्वमरुद्भ्यां वक्तव्यः। वा० पा० ५।२।१२२। इति पर्व–तन् मत्वर्थे। पर्वतः, मेघनाम–निघ० १।१०। मेघवद् अन्धकारस्य वर्धकानाम्। यद्वा। शैलवद् दृढस्वभावान्। यद्वा। शैलानां मध्ये स्थितानाम् ॥