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Atharvaveda / 3 / 2 / 2

अ॒यम॒ग्निर॑मूमुह॒द्यानि॑ चि॒त्तानि॑ वो हृ॒दि। वि वो॑ धम॒त्वोक॑सः॒ प्र वो॑ धमतु स॒र्वतः॑ ॥ 2॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 3 | Sukta : 2 | Paryay : | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अग्निः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : सेनापति के कर्तव्य का उपदेश।

पदपाठ : अ॒यम् । अ॒ग्नि: । अ॒मू॒मु॒ह॒त् । यानि॑ । चि॒त्तानि॑ । व॒: । हृ॒द‍ि । वि । व॒: । ध॒म॒तु॒ । ओक॑स: । प्र । व॒: । ध॒म॒तु॒ । स॒र्वत॑: ॥२.२॥

पदार्थ : (अयम्) इस (अग्निः) अग्नि [समान तेजस्वी राजा] ने (चित्तानि) उन ज्ञानों को (अमूमुहत्) उलट-पलट कर दिया है (यानि) जो (वः) तुम्हारे (हृदि) हृदय में [थे]। वह (वः) तुमको (ओकसः) घर से (वि, धमतु) निकाल देवे, वह (वः) तुमको (सर्वतः) सब स्थान से (प्र धमतु) बाहिर कर देवे ॥२॥ "

भावार्थ : जिस सेनापति राजा ने दुष्टों को वश में करके रक्खा था, वह राजा विरोधियों को प्रतिज्ञा भङ्ग करने पर देशनिकाला आदि दण्ड देवे ॥२॥

टिप्पणी :२−(अयम्)। समीपवर्ती। प्रसिद्धः। (अग्निः)। ज्ञानवान्। अग्निवत्तेजस्वी। (अमूमुहत्)। मुहेर्ण्यन्ताद् लुङि चङि रूपम्। व्याकुलीकृतवान्। (चित्तानि)। ज्ञानानि। (वः)। युष्माकम्। (हृदि)। हृञ् हरणे-क्विप्, तुक्, तस्य दः। हृदये। (वि)। विशेषेण। (वः)। युष्मान्। (धमतु)। धमति, गतिकर्मा-निघ० २।१४। वधकर्मा-निघ० २।१९। सौत्रो धातुः। अन्तर्भावितण्यर्थः। धमयतु। गमयतु। निःसारयतु। (ओकसः)। उच समवाये-असुन्, गुणः, न्यङ्क्वादित्वात् कुत्वम्। गृहात्। (सर्वतः)। सर्वप्रकारेण। अन्यत् सुगमम् ॥