Atharvaveda / 3 / 2 / 3
इन्द्र॑ चि॒त्तानि॑ मो॒हय॑न्न॒र्वाङाकू॑त्या चर। अ॒ग्नेर्वात॑स्य॒ ध्राज्या॒ तान्विषू॑चो॒ वि ना॑शय ॥ 3॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 3 | Sukta : 2 | Paryay : | Mantra No : 3
In English:
Seer : atharvaa | Devta : indraH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : indra chittaani mohayannarvaa~Naakuutyaa chara. agnervaatasya dhraajyaa taanviShuucho vi naashaya . 3.
Component Words : indra . chittaani . mohayan . arvaa~N . aa.akuutyaa . chara .agneH . vaatasya . dhraajyaa . taan . viShuuchaH . vi . naashaya .2.3.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : इन्द्रः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : सेनापति के कर्तव्य का उपदेश।
पदपाठ : इन्द्र॑ । चि॒त्तानि॑ । मो॒हय॑न् । अ॒र्वाङ् । आऽकू॑त्या । च॒र॒ ।अ॒ग्ने: । वात॑स्य । ध्राज्या॑ । तान् । विषू॑च: । वि । ना॒श॒य॒ ॥२.३॥
पदार्थ : (इन्द्र) हे महाप्रतापी राजन् ! [शत्रुओं के] (चित्तानि) चित्त को (मोहयन्) व्याकुल करता हुआ (अर्वाङ्) हमारे सन्मुख (आकूत्या) उत्तम संकल्प से (चर) आ। (अग्नेः) अग्नि के और (वातस्य) पवन के (ध्राज्या) झोंके से (तान्) उन (विषूचः) विरुद्ध गतिवालों को (वि, नाशय) नाश कर डाल ॥३॥ "
भावार्थ : जैसे अग्नि और वायु मिलकर प्रचण्ड हो जाते हैं, इसी प्रकार राजा प्रचण्ड होकर दुष्टों को दण्ड देवे और सत्कर्मी पुरुषों का शिष्टाचार करे ॥३॥ इस मन्त्र का दूसरा आधा अ० ३।१।५। में आ चुका है ॥
टिप्पणी :३−(इन्द्र)। हे परमैश्वर्यवन् राजन्। (चित्तानि)। मनांसि। (मोहयन्)। व्याकुलीकुर्वन्। (अर्वाङ्)। अवरे काले देशे वा अञ्चति। अवर+अञ्च-क्विन्, अर्वादेशः। अस्मदभिमुखः। (आकूत्या)। आङ्+कूञ् शब्दे-क्तिन्। संकल्पेन। अन्यद् व्याख्यातं सू० १ म० ५ ॥