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Atharvaveda / 4 / 4 / 3

यथा॑ स्म ते वि॒रोह॑तो॒ऽभित॑प्तमि॒वान॑ति। तत॑स्ते॒ शुष्म॑वत्तरमि॒यं कृ॑णो॒त्वोष॑धिः ॥ 3॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 4 | Paryay : | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : वनस्पतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : मनुष्य बल को बढ़ावे।

पदपाठ : यथा॑ । स्म॒ । ते॒ । वि॒ऽरोह॑त: । अ॒भित॑प्तम्ऽइव । अन॑ति । तत॑: । ते॒ । शुष्म॑वत्ऽतरम् । इ॒यम् । कृ॒णो॒तु॒ । ओष॑धि:॥४.३॥

पदार्थ : [हे मनुष्य !] (यथा स्म) जिस प्रकार से ही (ते विरोहतः) तुझ वृद्धिशील का [मन विद्या से] (अभितप्तमिव) प्रतापयुक्त सा (अनति) चेष्टा करता है, (ततः) उस प्रकार से ही (ते=त्वाम्) तुझे (इयम् ओषधिः) वह ओषधि (शुष्मवत्तरम्) अधिक बलयुक्त (कृणोतु) करे ॥३॥ "

भावार्थ : जिस प्रकार विद्याभ्यास से मनुष्यों का मन बढ़ता जावे उसी प्रकार परीक्षित उत्तम-उत्तम बलवर्धक वृषा आदि ओषधि और यथावत् आहार-विहार से अपना शरीरबल भी बढ़ावें ॥३॥

टिप्पणी :३−(यथा) येन प्रकारेण (स्म) खलु (ते) तव मनः (विरोहतः) रुह बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च-शतृ। वृद्धिशीलस्य (अभितप्तम् इव) तप दाहैश्ययोः-क्त। प्रतापयुक्तं यथा (अनति) अनिति चेष्टते (ततः) तेनैव प्रकारेण (ते) द्वितीयार्थे षष्ठी। त्वाम् (शुष्मवत्तरम्) अधिकबलयुक्तम् (इयम्) पूर्वोक्तां कृपां (कृणोतु) करोतु (ओषधिः) औषधम् ॥