Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 4 / 5 / 5

य आस्ते॒ यश्चर॑ति॒ यश्च॒ तिष्ठ॑न्वि॒पश्य॑ति। तेषां॒ सं द॑ध्मो॒ अक्षी॑णि॒ यथे॒दं ह॒र्म्यं तथा॑ ॥ 5॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 5 | Paryay : | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : वृषभः, स्वापनम् | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : बच्चों के सुलाने का गीत अर्थात् लोरी।

पदपाठ : य: । आस्ते॑ । य: । चर॑ति । य: । च॒ । तिष्ठ॑न् । वि॒ऽपश्य॑ति । तेषा॑म् । सम् । द॒ध्म॒: । अक्षी॑णि । यथा॑ । इ॒दम् । ह॒र्म्यम् । तथा॑ ॥५.५॥

पदार्थ : (यः) जो कोई (आस्ते) बैठता है, (यः) जो (चरति) चलता है, (च) और (यः) जो (तिष्ठन्) खड़े होकर (विपश्यति) विविध प्रकार से देखता है, (तेषाम्) उनकी (अक्षीणि) आँखों को (तथा) उस प्रकार से (संदध्मः) हम मूँदते हैं, (यथा) जैसे (इदम्) इस (हर्म्यम्) हर्म्य [धनियों के मनोहर घर] को ॥५॥ "

भावार्थ : जैसे धनिक लोगों के घर सुरक्षित होते हैं, जिन्हें बन्ध करके सुखपूर्वक वे सोते हैं, वैसे ही घर सब गृहस्थ बनावें, जिनमें निर्भय होकर रात्रि को आनन्द से सोवें ॥५॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद मं० ७।५५।६। में है ॥

टिप्पणी :५−(यः) (आस्ते) उपविशति (यः) (चरति) संचरति (यः च) (तिष्ठन्) स्थितः सन् (विपश्यति) विविधम् इतस्ततः पश्यति (तेषाम्) (संदध्मः) संहितानि निमीलितानि अदर्शकानि कुर्मः (अक्षीणि) चक्षूंषि (यथा) येन प्रकारेण (इदम्) दृश्यमानम् (हर्म्यम्) अघ्न्यादयश्च। उ० ४।११२। इति हृञ् हरणे-यक्, मुट् च। हरति मनांसि। धनिनां वासम्। मनोहरं गृहम् (तथा) तेन प्रकारेण ॥