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Atharvaveda / 4 / 25 / 4

अपे॒तो वा॑यो सवि॒ता च॑ दुष्कृ॒तमप॒ रक्षां॑सि॒ शिमि॑दां च सेधतम्। सं ह्यू॒र्जया॑ सृ॒जथः॒ सं बले॑न॒ तौ नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥ 4॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 25 | Paryay : | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : मृगारः | देवता : वायुः, सविता | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :

विषय : पवन और सूर्य के गुणों का उपदेश।

पदपाठ : अप॑ । इ॒त: । वा॒यो॒ इति॑ । स॒वि॒ता । च॒ । दु॒:ऽकृ॒तम् । अप॑ । रक्षां॑सि । शिमि॑दाम् । च॒ । से॒ध॒त॒म् । सम् । हि । ऊ॒र्जया॑ । सृ॒जथ॑: । सम् । बले॑न । तौ । न॒: । मु॒ञ्च॒त॒म् । अंह॑स: ॥२५.४॥

पदार्थ : (वायो) हे वायु (च) और (सविता) हे सूर्य ! तुम दोनों (इतः) यहाँ से (दुष्कृतम्) मलिन काम को (अप=अप सेधतम्) हटा दो, (रक्षांसि) निवारणीय रोगों (च) और (शिमिदाम्) कर्म छेदन करने हारी पीड़ा को (अप सेधतम्) निकाल दो। (हि) क्योंकि (उर्जया) आत्मिक पुष्टि के साथ (सं सृजथः) तुम दोनों मिलाते हो और (बलेन) शारीरिक बल के साथ (सम्=सं सृजथः) तुम संयुक्त करते हो, (तौ) सो तुम दोनों (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चतम्) छुड़ावो ॥४॥"

भावार्थ : मनुष्य पवन और सूर्य के यथावत् सेवन और उपयोग से दोषों और मलीनता को दूर करके स्वस्थ रहें और आत्मिक और शारीरिक बल बढ़ाकर संसार में उन्नति करें ॥४॥

टिप्पणी :४−(अप)=अप सेधतम् (इतः) अस्मात्स्थानात् (वायो) (सविता) हे सवितः ! (च) समुच्चये (दुष्कृतम्) दुष्टं कर्म (अप सेधतम्) षिध गत्याम्, अन्तर्गतो णिजर्थः। अपगमयतम् (रक्षांसि) रक्षो रक्षितव्यमस्मात्-निरु० ४।१८। उपद्रवकारिणो रोगान् (शिमिदाम्) सर्वधातुभ्य इन्। उ० ४।११८। इति शम उपशमे-इन्, आकारस्य इकारः। शिमी कर्मनाम-निघ० २।१। दाप् लवने-ड। टाप्। कर्मछेदिकां पीडाम् (च) (हि) अवश्यम् (ऊर्जया) ऊर्ज बलप्राणनयोः-पचाद्यच्, टाप्। पुष्ट्या। मानसिकपराक्रमेण (संसृजथः) संयोजयथः (सम्) संसृजथः (बलेन) शारीकसामर्थ्येन। अन्यत् पूर्ववत् ॥