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Atharvaveda / 5 / 8 / 5

यम॒मी पु॑रोदधि॒रे ब्र॒ह्माण॒मप॑भूतये। इन्द्र॒ स ते॑ अधस्प॒दं तं प्रत्य॑स्यामि मृ॒त्यवे॑ ॥ 5॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 5 | Sukta : 8 | Paryay : | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : इन्द्रः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : राजा के धर्म का उपदेश।

पदपाठ : यम् । अ॒मी इति॑ । पु॒र॒:ऽद॒धि॒रे । ब्र॒ह्माण॑म् । अप॑ऽभूतये ।इन्द्र॑ । स: । ते॒ । अ॒ध॒:ऽप॒दम् । तम् । प्रति॑ । अ॒स्या॒मि॒ । मृ॒त्यवे॑॥।८.५॥

पदार्थ : (अमी) इन [शत्रुओं] ने (यम्) जिस (ब्रह्माणम्) वृद्धिशील पुरुष को (अपभूतये) हमारी हार के लिये (पुरोदधिरे) उच्च पद पर रक्खा है। (इन्द्र) हे बड़े ऐश्वर्यवाले राजन् ! (सः) वह मैं (ते) तेरे (अधस्पदम्) पाँव के नीचे (तम्) उसको (मृत्यवे) मृत्यु के लिये (प्रति) प्रतिकूलता से (अस्यामि) फेंकता हूँ ॥५॥"

भावार्थ : शत्रु लोग जिस विद्वान् पुरुष को बहकाकर बड़ा पद देकर हमारी हानि करावें, हमारे राजपुरुष उसको पकड़कर प्राणान्त तक दण्ड देवे ॥५॥

टिप्पणी :५−(यम्) (अमी) शत्रवः (पुरोदधिरे) अग्रे धृतवन्तः। प्रधानपदे स्थापितवन्तः (ब्रह्माणम्) ब्रह्मा परिवृढः श्रुततो ब्रह्म परिवृढं सर्वतः−निरु० १।८। वृद्धिशीलं विद्वांसम् (अपभूतये) अस्माकं पराजयाय (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् राजन् (सः) सोऽहम् (ते) तव (अधस्पदम्) अ० २।७।२। अधोभागे पादतले (तम्) शत्रुम् (प्रति) प्रतिकूलतया (अस्यामि) प्रक्षिपामि (मृत्यवे) मरणाय ॥