Atharvaveda / 5 / 8 / 6
यदि॑ प्रे॒युर्दे॑वपु॒रा ब्रह्म॒ वर्मा॑णि चक्रि॒रे। त॑नू॒पानं॑ परि॒पाणं॑ कृण्वा॒ना यदु॑पोचि॒रे सर्वं॒ तद॑र॒सं कृ॑धि ॥ 6॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 5 | Sukta : 8 | Paryay : | Mantra No : 6
In English:
Seer : atharvaa | Devta : indraH | Metre : aastaarapa~NktiH | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : yadi preyurdevapuraa brahma varmaaNi chakrire. tanuupaana.m paripaaNa.m kRRiNvaanaa yadupochire sarva.m tadarasa.m kRRidhi . 6.
Component Words : yadi. pra.aiiyuH . deva.apuraaH . brahma . varmaaNi . chakrire . tanuu.apaanam . pari.apaanam . kRRiNvaanaaH . yat . upa.auuchire . sarvam . tat . arasam . kRRidhi.8.6.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : इन्द्रः | छन्द : आस्तारपङ्क्तिः | स्वर :
विषय : राजा के धर्म का उपदेश।
पदपाठ : यदि॑। प्र॒ऽई॒यु: । दे॒व॒ऽपु॒रा: । ब्रह्म॑ । वर्मा॑णि । च॒क्रि॒रे । त॒नू॒ऽपान॑म् । प॒रि॒ऽपान॑म् । कृ॒ण्वा॒ना: । यत् । उ॒प॒ऽऊ॒चि॒रे । सर्व॑म् । तत् । अ॒र॒सम् । कृ॒धि॒॥८.६॥
पदार्थ : (यदि) जो [शत्रुओं ने] (देवपुराः) राजा के नगरों पर (प्रेयुः) चढ़ाई की है, और (ब्रह्म) हमारे धन को (वर्माणि) अपने रक्षासाधन (चक्रिरे) बनाया है। (तनूपानम्) हमारे शरीर रक्षासाधन को (परिपाणम्) अपना रक्षासाधन (कृण्वानाः) बनाते हुए उन लोगों ने (यत्) जो कुछ (उपोचिरे) डींग मारी है, (तत् सर्वम्) उस सब को (अरसम्) नीरस वा फींका (कृधि) कर दे ॥६॥"
भावार्थ : राजा उपद्रवी शत्रुओं को जीतकर प्रजा की सदा रक्षा करे ॥६॥
टिप्पणी :६−(यदि) सम्भावनायाम् (प्रेयुः) इण्−लिट्। प्रजग्मुः (देवपुराः) ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे। पा० ५।४।७४। इति देव+पुर्−अ प्रत्ययः, टाप्। राजनगरीः (ब्रह्म) अस्माकं धनम्−निघ० २।१०। (वर्माणि) स्वकीयानि रक्षासाधनानि (चक्रिरे) आत्मसात्कृतवन्तः (तनूपानम्) अस्माकं शरीरं रक्षासाधनम् (परिपाणम्) स्वकीयं परित्राणम् (कृण्वानाः) आत्मसात्कृतवन्तः (यत्) वचनम् (उपोचिरे) उप हीने। वच−लिट्। कुत्सितमुक्तवन्तः (सर्वम्) सकलम् (तत्) कर्म (अरसम्) असमर्थम् (कृधि) कुरु ॥