Atharvaveda / 5 / 17 / 17
नास्मै॒ पृश्निं॒ वि दु॑हन्ति॒ येऽस्या॒ दोह॑मु॒पास॑ते। यस्मि॑न्रा॒ष्ट्रे नि॑रु॒ध्यते॑ ब्रह्मजा॒याचि॑त्त्या ॥ 17॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 5 | Sukta : 17 | Paryay : | Mantra No : 17
In English:
Seer : mayobhuuH | Devta : brahmajaayaa | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : naasmai pRRishni.m vi duhanti ye.asyaa dohamupaasate. yasminraaShTre nirudhyate brahmajaayaachittyaa . 17.
Component Words : na . asmai . pRRishna.Nim . vi . duhanti . ye . asyaaH . doham . upa.aaasate . yasmin . raaShTre . ni.arudhyate . brahma.ajaayaa . achittyaa .17.17.
In Hindi:
ऋषि : मयोभूः | देवता : ब्रह्मजाया | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : ब्रह्म विद्या का उपदेश।
पदपाठ : न । अ॒स्मै॒ । पृश्नि॑म् । वि । दु॒ह॒न्ति॒ । ये । अ॒स्या॒: । दोह॑म् । उ॒प॒ऽआस॑ते । यस्मि॑न् । रा॒ष्ट्रे । नि॒ऽरु॒ध्यते॑ । ब्र॒ह्म॒ऽजा॒या । अचि॑त्त्या ॥१७.१७॥
पदार्थ : (अस्मै) उस [राजा] के लिये (पृश्निम्) स्पर्शवती पृथिवी को [वे लोग] (वि) विशेष करके (न) नहीं (दुहन्ति) दुहते हैं (ये) जो (अस्याः) इस [भूमि] के (दोहम्) रस को (उपासते) सेवन करते हैं। (यस्मिन् राष्ट्रे) जिस राज्य में (ब्रह्मजाया) वेदविद्या (अचित्त्या) अचेतपन से (निरुध्यते) रोकी जाती है ॥१७॥"
भावार्थ : टिप्पणी :१७−(न) निषेधे (अस्मै) राज्ञे (पृश्निम्) स्पर्शवतीं भूमिम् (वि) विशेषेण (दुहन्ति) प्रपूरयन्ति (ये) पुरुषाः (अस्याः) पृश्नेः (दोहम्) रसम् (उपासते) सेवन्ते। अन्यद् यथा म० १२ ॥