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Atharvaveda / 5 / 26 / 6

एयम॑गन्ब॒र्हिषा॒ प्रोक्ष॑णीभिर्य॒ज्ञं त॑न्वा॒नादि॑तिः॒ स्वाहा॑ ॥ 6॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 5 | Sukta : 26 | Paryay : | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अदिति | छन्द : द्विपदा प्राजापत्या बृहती | स्वर :

विषय : समाज की वृद्धि करने का उपदेश।

पदपाठ : आ । इ॒यम् । अ॒ग॒न् । ब॒र्हिषा॑ । प्र॒ऽउक्ष॑णीभि: । य॒ज्ञम् । त॒न्वा॒ना । अदि॑ति: । स्वाहा॑ ॥२६.६॥

पदार्थ : (इयम्) यह (अदितिः) अखण्ड नीति (स्वाहा) सुन्दर वाणी के साथ (बर्हिषा) उद्यम से और (प्रोक्षणीभिः) अच्छी-अच्छी वृद्धियों से (यज्ञम्) आपस में मिलाप (तन्वाना) फैलाती हुई (आ अगन्) आई है ॥६॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :६−(इयम्) प्रसिद्धा वैदिकी (आ अगन्) आगमत् (बर्हिषा) बर्ह उद्यमने−इसि। उद्यमेन (प्रोक्षणीभिः) प्र+उक्ष सेचने वृद्धौ च−ल्युट्, ङीप्। प्रकृष्टवृद्धिभिः। उक्षण उक्षतेर्वृद्धिकर्मण उक्षन्त्युदकेनेति वा−निरु० १२।९। (यज्ञम्) संगमम् (तन्वाना) तनु विस्तारे−शानच्। विस्तारयन्ती सती (अदितिः) अ० २।२८।४। वाङ्नाम−निघ० १।११। अखण्डनीतिः (स्वाहा) सुवाण्या ॥