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Atharvaveda / 5 / 26 / 7

विष्णु॑र्युनक्तु बहु॒धा तपां॑स्य॒स्मिन्य॒ज्ञे सु॒युजः॒ स्वाहा॑ ॥ 7॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 5 | Sukta : 26 | Paryay : | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : विष्णुः | छन्द : द्विपदा प्राजापत्या बृहती | स्वर :

विषय : समाज की वृद्धि करने का उपदेश।

पदपाठ : विष्णु॑: । यु॒न॒क्तु॒ । ब॒हु॒ऽधा । तपा॑सि । अ॒स्मिन् । य॒ज्ञे । सु॒ऽयुज॑: । स्वाहा॑ ॥२६.७॥

पदार्थ : (सुयुजः) सुयोग्य (विष्णुः) कामों में व्यापक पुरुष (स्वाहा) सुन्दर वाणी से (बहुधा) अनेक प्रकार (तपांसि) अपनी विभूतियों को (अस्मिन्) इस (यज्ञे) परस्पर मेल में (युनक्तु) लगावे ॥७॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :७−(विष्णुः) कर्मसु व्यापकः पुरुषः (युनक्तु) योजयतु (बहुधा) अनेकप्रकारेण (तपांसि) तप संतापे ऐश्वर्ये च−असुन्। ऐश्वर्याणि। विभूतयः। अन्यद् गतम् ॥