Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 8 / 10 / 2 / 10

अ॒पो वा॑मदे॒व्यं य॒ज्ञं य॑ज्ञाय॒ज्ञियं॒ य वेद॑ ॥ 10॥

Veda : Atharvaveda | Paryay : 2 | Sukta : 10 | Paryay : 2 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : अथर्वाचार्यः | देवता : विराट् | छन्द : साम्नी बृहती | स्वर :

विषय : ब्रह्मविद्या का उपदेश।

पदपाठ : अ॒प: । वा॒म॒ऽदे॒व्यम् । य॒ज्ञम् । य॒ज्ञा॒य॒ज्ञिय॑म् । य: । ए॒वम् । वेद॑ ॥११.१०॥

पदार्थ : (रथन्तरम्) रथन्तर [रमणीय पदार्थों से पार लगानेवाला, जगत्] (एव) ही (व्यचः) विस्तृत (बृहत्) बृहत् [बड़े आकाश] से (ओषधीः) अन्न आदि ओषधियों को, और (अपः) सब प्रजाओं और (वामदेव्यम्) वामदेव [मनोहर परमात्मा] से जताये गये [पञ्चभूत] से (यज्ञम्) पूजनीय व्यवहार और (यज्ञायज्ञियम्) सब यज्ञों के हितकारी [वेदज्ञान] को (अस्मै) उस [पुरुष] के लिये (दुहे) दोहता है, (यः एवम् वेद) जो ऐसा जानता है ॥९, १०॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :९, १०−(अस्मै) ब्रह्मज्ञानिने (दुहे) द्विकर्मकः। दुग्धे। प्रपूरयति (व्यचः) विस्तृतम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥