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Atharvaveda / 9 / 6 / 1 / 8

यदु॑पस्तृ॒णन्ति॑ ब॒र्हिरे॒व तत् ॥ 8॥

Veda : Atharvaveda | Paryay : 1 | Sukta : 6 | Paryay : 7 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अतिथिः, विद्या | छन्द : याजुषी त्रिष्टुप् | स्वर :

विषय : संन्यासी और गृहस्थ के धर्म का उपदेश।

पदपाठ : यत् । उ॒प॒ऽस्तृ॒णन्ति॑ । ब॒र्हि: । ए॒व । तत् ॥६.८॥

पदार्थ : (यत्) जो कुछ वे [गृहस्थ] (उपस्तृणन्ति) बिछोना करते हैं, (तत्) वह [संन्यासी के लिये] (बर्हिः) कुशासन (एव) ही होता है ॥८॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :८−(यत्) यत्किंचित् (उपस्तृणन्ति) आच्छादनानि कुर्वन्ति (बर्हिः) अ० ५।२२।१। कुशासनम्। यज्ञसामग्री ॥