Atharvaveda / 9 / 6 / 2 / 8
सर्वो॒ वा ए॒ष ज॒ग्धपा॑प्मा॒ यस्यान्न॑म॒श्नन्ति॑ ॥ 8॥
Veda : Atharvaveda | Paryay : 2 | Sukta : 6 | Paryay : 8 | Mantra No : 8
In English:
Seer : brahmaa | Devta : atithiH, vidyaa | Metre : aasurii gaayatrii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : sarvo vaa eSha jagdhapaapmaa yasyaannamashnanti . 8.
Component Words : sarvaH . vai . eShaH . jagdha.apaapmaa . yasya . annam . ashnanti .7.8.
In Hindi:
ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अतिथिः, विद्या | छन्द : आसुरी गायत्री | स्वर :
विषय : अतिथि के सत्कार का उपदेश।
पदपाठ : सर्व॑: । वै । ए॒ष: । ज॒ग्धऽपा॑प्मा । यस्य॑ । अन्न॑म् । अ॒श्नन्ति॑ ॥७.८॥
पदार्थ : (सर्वः) प्रत्येक (एषः वै) वही गृहस्थ (जग्धपाप्मा) भक्षण [नाश] किये हुए पापवाला [होता है] (यस्य अन्नम्) जिसका अन्न (अश्नन्ति) वे [महामान्य] खाते हैं ॥८॥"
भावार्थ : टिप्पणी :८−(सर्वः) प्रत्येकः (वै) एव (एषः) गृहस्थः (जग्धपाप्मा) अद भक्षणे-क्त। अदो जग्धिर्ल्यप्ति किति। पा० २।४।३६। जग्धादेशः। नामन्सीमन्व्योमन्। उ० ४।१५१। पा रक्षणे, पा पाने वा-मनिन् धातोः पुक्। भक्षितं नाशितं पापं येन (यस्य) गृहस्थस्य (अन्नम्) (अश्नन्ति) खादन्ति ॥