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Atharvaveda / 9 / 6 / 3 / 4

प्र॒जां च॒ वा ए॒ष प॒शूंश्च॑ गृ॒हाणा॑मश्नाति॒ यः पूर्वोऽति॑थेर॒श्नाति॑ ॥ 4॥

Veda : Atharvaveda | Paryay : 3 | Sukta : 6 | Paryay : 9 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अतिथिः, विद्या | छन्द : त्रिपदा पिपीलिकमध्या गायत्री | स्वर :

विषय : अतिथि के सत्कार का उपदेश।

पदपाठ : प्र॒ऽजाम् । च॒ । वै । ए॒ष: । प॒शून् । च॒ । गृ॒हाणा॑म् । अ॒श्ना॒ति॒ । य: । पूर्व॑: । अति॑थे: । अ॒श्नाति॑ ॥८.४॥

पदार्थ : (एषः) वह [गृहस्थ] (वै) निश्चय करके (प्रजाम्) प्रजा (च च) और (पशून्) पशुओं को (गृहाणाम्) घरों के बीच (अश्नाति) भक्षण [अर्थात् नाश] करता है, (यः) जो (अतिथेः पूर्वः) अतिथि से पहिले (अश्नाति) खाता है ॥४॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :४-सुगमम् ॥