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Atharvaveda / 9 / 6 / 6 / 6

यत्स॑भा॒गय॑ति॒ दक्षि॑णाः सभागयति॒ यद॑नु॒तिष्ठ॑त उ॒दव॑स्यत्ये॒व तत् ॥ 6॥

Veda : Atharvaveda | Paryay : 6 | Sukta : 6 | Paryay : 12 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अतिथिः, विद्या | छन्द : आर्ची बृहती | स्वर :

विषय : अतिथि के सत्कार का उपदेश।

पदपाठ : यत् । स॒भा॒गय॑ति । दक्षि॑णा: । स॒भा॒ग॒य॒ति॒ । यत् । अ॒नु॒ऽतिष्ठ॑ते । उ॒त्ऽअव॑स्यति । ए॒व । तत् ॥११.६॥

पदार्थ : (यत्) जब वह [गृहस्थ अन्न आदि] (सभागयति) बाँटता है, वह [अतिथि] (दक्षिणाः) वृद्धि क्रियाओं को (सभागयति) बाँटता है, [इसलिये] वह [गृहस्थ] (यत्) जब (अनुतिष्ठते) [शास्त्रोक्त कर्म] करता है, (तत्) तब वह [उसको] (एव) निश्चय करके (उदवस्यति) पूरा कर डालता है ॥६॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :६−(यत्) यदा (सभागयति) समानश्चासौ भागश्च। तत्करोतीत्युपसंख्यानम्। वा० पा० ३।१।२६। सभाग-णिच्। भागशो ददाति (दक्षिणाः) अ० ५।७।१। दक्ष वृद्धौ−इनन्। वृद्धिक्रियाः (सभागयति) (यत्) (अनुतिष्ठते) विहितं कर्म करोति (उदवस्यति) षो अन्तकर्मणि-लट्। समापयति (एव) (तत्) ॥