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Atharvaveda / 9 / 6 / 6 / 8

स उप॑हूतो॒ऽन्तरि॑क्षे भक्षय॒त्युप॑हूत॒स्तस्मि॒न्यद॒न्तरि॑क्षे वि॒श्वरू॑पम् ॥ 8॥

Veda : Atharvaveda | Paryay : 6 | Sukta : 6 | Paryay : 12 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अतिथिः, विद्या | छन्द : आर्ची बृहती | स्वर :

विषय : अतिथि के सत्कार का उपदेश।

पदपाठ : स: । उप॑ऽहूत: । अ॒न्तरि॑क्षे । भ॒क्ष॒य॒ति॒ । उप॑ऽहूत: । तस्मि॑न् । यत् । अ॒न्तरि॑क्षे । वि॒श्वऽरू॑पम् ॥११.८॥

पदार्थ : (सः) वह [अतिथि जब] (उपहूतः) बुलाया गया [अन्तरिक्षे] अन्तरिक्ष में [वर्तमान वायु आदि] (भक्षयति) भोगता है, (तस्मिन्) उसके [भोग करने के] उपरान्त (उपहूतः) बुलाया गया वह [गृहस्थ] (अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष में (यत्) जो कुछ (विश्वरूपम्) विविध रूप [वस्तु है, उसे भोगता है] ॥८॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :८−(अन्तरिक्षे) अ० १।३०।३। मध्यलोके वर्तमानं वाय्वादिपदार्थजातम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥