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Atharvaveda / 9 / 6 / 6 / 9

स उप॑हूतो दि॒वि भ॑क्षय॒त्युप॑हूत॒स्तस्मि॒न्यद्दि॒वि वि॒श्वरू॑पम् ॥ 9॥

Veda : Atharvaveda | Paryay : 6 | Sukta : 6 | Paryay : 12 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अतिथिः, विद्या | छन्द : आर्ची बृहती | स्वर :

विषय : अतिथि के सत्कार का उपदेश।

पदपाठ : स: । उप॑ऽहूत: । दि॒व‍ि । भ॒क्ष॒य॒ति॒ । उप॑ऽहूत: । तस्मि॑न् । यत् । दि॒वि। वि॒श्वऽरू॑पम् ॥११.९॥

पदार्थ : (सः) वह [अतिथि जब] (उपहूतः) बुलाया गया (दिवि) सूर्य में [वर्तमान प्रकाश, धारण, आकर्षण आदि गुण] (भक्षयति) भोगता है, (तस्मिन्) उसके [भोग करने के] उपरान्त (उपहूतः) बुलाया गया वह [गृहस्थ] (दिवि) सूर्यलोक में (यत्) जो कुछ (विश्वरूपम्) विविध रूप [वस्तु है, उसे भोगता है] ॥९॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :९−(दिवि) सूर्यमण्डले वर्तमानं प्रकाशधारणाकर्षणादिगुणम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥