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Atharvaveda / 9 / 6 / 6 / 10

स उप॑हूतो दे॒वेषु॑ भक्षय॒त्युप॑हूत॒स्तस्मि॒न्यद्दे॒वेषु॑ वि॒श्वरू॑पम् ॥ 10॥

Veda : Atharvaveda | Paryay : 6 | Sukta : 6 | Paryay : 12 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अतिथिः, विद्या | छन्द : आर्ची बृहती | स्वर :

विषय : अतिथि के सत्कार का उपदेश।

पदपाठ : स: । उप॑ऽहूत: । दे॒वेषु॑ । भ॒क्ष॒य॒ति॒ । उप॑ऽहूत: । तस्मि॑न् । यत् । दे॒वेषु॑ । वि॒श्वऽरू॑पम् ॥११.१०॥

पदार्थ : (सः) वह [अतिथि जब] (उपहूतः) बुलाया गया (देवेषु) विद्वानों में [वर्तमान ब्रह्मचर्य, वेदाध्ययन, ईश्वरप्रणिधान आदि शुभ गुण] (भक्षयति) भोगता है, (तस्मिन्) उसके [भोग करने के] उपरान्त (उपहूतः) बुलाया गया वह [गृहस्थ] (देवेषु) विद्वानों में (यत्) जो कुछ (विश्वरूपम्) विविध रूप [वस्तु है, उसे भोगता है] ॥१०॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१०−(देवेषु) विद्वत्सु वर्तमानं ब्रह्मचर्यस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानादिशुभगुणम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥