Atharvaveda / 9 / 10 / 22
कृ॒ष्णं नि॒यानं॒ हर॑यः सुप॒र्णा अ॒पो वसा॑ना॒ दिव॒मुत्प॑तन्ति। तं आव॑वृत्र॒न्त्सद॑नादृ॒तस्यादिद्घृ॒तेन॑ पृथि॒वीं व्यू᳡दुः ॥ 22॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 9 | Sukta : 10 | Paryay : | Mantra No : 22
In English:
Seer : brahmaa | Devta : gauH, viraaT, adhyaatmam | Metre : triShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : kRRiShNa.m niyaana.m harayaH suparNaa apo vasaanaa divamutpatanti. ta.m aavavRRitrantsadanaadRRitasyaadidghRRitena pRRithivii.m vyuu᳡duH . 22.
Component Words : kRRiShNam . ni.ayaanam . harayaH . su.aparNaaH . apaH . vasaanaaH . divam . ut . patanti . te . aa . avavRRitran . sadanaat . RRitasya . aat . it . ghRRitena . pRRithiviim . vi . uuduH .15.22.
In Hindi:
ऋषि : ब्रह्मा | देवता : गौः, विराट्, अध्यात्मम् | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :
विषय : जीवात्मा और परमात्मा के लक्षणों का उपदेश।
पदपाठ : कृ॒ष्णम् । नि॒ऽयान॑म् । हर॑य: । सु॒ऽप॒र्णा: । अ॒प: । वसा॑ना: । दिव॑म् । उत् । प॒त॒न्ति॒ । ते । आ । अ॒व॒वृ॒त्र॒न् । सद॑नात् । ऋ॒तस्य॑ । आत् । इत् । घृ॒तेन॑ । पृ॒थि॒वीम् । वि । ऊ॒दु॒: ॥१५.२२॥
पदार्थ : (हरयः) रस खींचनेवाली, (सुपर्णाः) अच्छा उड़नेवाली किरणें (अपः) जल को (वसानाः) ओढ़कर (कृष्णम्) खींचनेवाले, (नियानम्) नित्य गमनस्थान अन्तरिक्ष में होकर (दिवम्) प्रकाशमय सूर्यमण्डल को (उत् पतन्ति) चढ़ जाती हैं। (ते) वे (इत्) ही (आत्) फिर (ऋतस्य) जल के (सदनात्) घर [सूर्य] से (आ अववृत्रन्) लौट आती हैं, और उन्होंने (घृतेन) जल से (पृथिवीम्) पृथिवी को (वि) विविध प्रकार से (ऊदुः) सींच दिया है ॥२२॥"
भावार्थ : टिप्पणी :२२-अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ० ६।२२।१ ॥