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Atharvaveda / 11 / 10 / 17

यदि॑ प्रे॒युर्दे॑वपु॒रा ब्रह्म॒ वर्मा॑णि चक्रि॒रे। त॑नू॒पानं॑ परि॒पाणं॑ कृण्वा॒ना यदु॑पोचि॒रे सर्वं॒ तद॑र॒सं कृ॑धि ॥ 17॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 11 | Sukta : 10 | Paryay : | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : भृग्वङ्गिराः | देवता : त्रिषन्धिः | छन्द : पथ्यापङ्क्तिः | स्वर :

विषय : राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

पदपाठ : यदि॑ । प्र॒ऽई॒यु: । दे॒व॒ऽपु॒रा: । ब्रह्म॑ । वर्मा॑णि । च॒क्रि॒रे । त॒नू॒ऽपान॑म् । प॒रि॒ऽपान॑म् । कृ॒ण्वा॒ना: । यत् । उ॒प॒ऽऊ॒चि॒रे । सर्व॑म् । तत् । अ॒र॒सम् । कृ॒धि॒ ॥१२.१७॥

पदार्थ : (यदि) जो [शत्रुओं ने] (देवपुराः) राजा के नगरों पर (प्रेयुः) चढ़ाई की है, और (ब्रह्म) हमारे धन को (वर्माणि) अपने रक्षासाधन (चक्रिरे) बनाया है। (तनूपानम्) हमारे शरीर रक्षासाधन को (परिपाणम्) अपना रक्षासाधन (कृण्वानाः) बनाते हुए उन लोगों ने (यत्) जो कुछ (उपोचिरे) डींग मारी है, (तत् सर्वम्) उस सबको (अरसम्) नीरस वा फींका (कृधि) कर दे ॥१७॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१७−अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ० ५।८।६ ॥