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Atharvaveda / 13 / 1 / 17

वाच॑स्पते पृथि॒वी नः॑ स्यो॒ना स्यो॒ना योनि॒स्तल्पा॑ नः सु॒शेवा॑। इ॒हैव प्रा॒णः स॒ख्ये नो॑ अस्तु॒ तं त्वा॑ परमेष्ठि॒न्पर्य॒ग्निरायु॑षा॒ वर्च॑सा दधातु ॥ 17॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 13 | Sukta : 1 | Paryay : | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अध्यात्मम्, रोहितः, आदित्यः | छन्द : पञ्चपदा ककुम्मती जगती | स्वर :

विषय : जीवात्मा और परमात्मा का उपदेश।

पदपाठ : वाच॑: । प॒ते॒ । पृ॒थि॒वी । न॒: । स्यो॒ना । स्यो॒ना: । योनि॑: । तल्पा॑ । न॒: । सु॒ऽशेवा॑ । इ॒ह । ए॒व । प्रा॒ण: । स॒ख्ये । न॒: । अ॒स्तु॒ । तम् । त्वा॒ । प॒र॒मे॒ऽस्थि॒न्। परि॑ । अ॒ग्नि: ।आयु॑षा । वर्च॑सा । द॒धा॒तु॒ ॥१.१७॥

पदार्थ : (वाचः पते) हे वेदवाणी के स्वामी [परमेश्वर !] (नः) हमारे लिये (पृथिवी) पृथिवी (स्योना) सुखदायक, (योनिः) घर (स्योना) सुखदायक और (तल्पाः) खाट (नः) हमारे लिये (सुशेवा) बड़ी सुखदायक [होवे]। (इह एव) यहाँ ही [इसी मनुष्यजन्म में] (प्राणः) प्राण [जीवनवायु] (नः) हमारी (सख्ये) मित्रता में (अस्तु) होवे, (परमेष्ठिन्) हे बड़े ऊँचे पदवाले [परमेश्वर !] (तम् त्वा) उस तुझको (अग्निः) ज्ञानवान् [यह पुरुष] (आयुषा) आयु के साथ और (वर्चसा) प्रताप के साथ (परि) सब ओर से (दधातु) धारण करे ॥१७॥"

भावार्थ :