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Atharvaveda / 15 / 11 / 3

यदे॑न॒माह॒व्रात्य॒ क्वा᳡वात्सी॒रिति॑ प॒थ ए॒व तेन॑ देव॒याना॒नव॑ रुन्द्धे ॥3॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 11 | Paryay : | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : निचृत् आर्ची बृहती | स्वर :

विषय : अतिथिसत्कार के विधान का उपदेश।

पदपाठ : यत् । ए॒न॒म् । आह॑ । व्रात्य॑ । क्व᳡ । अ॒वा॒त्सी॒: । इति॑ । प॒थ: । ए॒व । तेन॑ । दे॒व॒ऽयाना॑न् । अव॑ । रु॒न्ध्दे॒ ॥११.३॥

पदार्थ : (यत्) जब (एनम्) इस [अतिथि] से (आह) वह [गृहस्थ] कहता है−(व्रात्य) हे व्रात्य ! [सद्व्रतधारी] (क्व) कहाँ (अवात्सीः इति) [रात्रि में] तू रहा था ? (तेन) उस [सत्कार] से (एव)निश्चय करके (देवयानान्) विद्वानों के चलने योग्य (पथः) मार्गों को (अवरुन्द्धे) वह [अपने लिये] सुरक्षित करता है ॥३॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :३−(यत्) यदा (एनम्) अतिथिम् (आह) ब्रूते (पथः) मार्गान् (एव)निश्चयेन (तेन) सत्कारेण (देवयानान्) विद्वद्भिर्गन्तव्यान् (अव रुन्द्धे)आत्मने सुरक्षति। अन्यत् पूर्ववत् ॥