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Atharvaveda / 15 / 11 / 4

यदे॑न॒माह॑व्रात्योद॒कमित्य॒प ए॒व तेनाव॑ रुन्द्धे ॥4॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 11 | Paryay : | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : निचृत् आर्ची बृहती | स्वर :

विषय : अतिथिसत्कार के विधान का उपदेश।

पदपाठ : यत् । ए॒न॒म् । आह॑ । व्रात्य॑ । उ॒द॒कम् । इति॑ । अ॒प: । ए॒व । तेन॑ । अव॑ ।रु॒न्ध्दे॒ ॥११.४॥

पदार्थ : (यत्) जब (एनम्) इस [अतिथि] से (आह) वह [गृहस्थ] कहता है−(व्रात्य) हे व्रात्य ! [सद्व्रतधारी] (उदकम् इति) यह जल है−(तेन) उस [सत्कार] से (एव) निश्चय करके (अपः) सत्कर्म को (अव रुन्द्धे) वह [अपने लिये] सुरक्षित करता है ॥४॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :४−(अपः) आपः कर्माख्यायां ह्रस्वो नुट् च वा। उ०४।२०८। आप्लृ व्याप्तौ-असुन् ह्रस्वश्च। कर्म-निघ० २।१। सत्कर्म। अन्यत्पूर्ववत् ॥