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Atharvaveda / 15 / 14 / 14

स्व॑धाका॒रेणा॑न्ना॒देनान्न॑मत्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥14॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 14 | Paryay : | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : भुरिक् प्राजापत्या अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : अतिथिके उपकार का उपदेश।

पदपाठ : स्व॒धा॒ऽका॒रेण॑ । अ॒न्न॒ऽअ॒देन॑ । अन्न॑म् । अ॒त्ति॒ । य: । ए॒वम् । वेद॑ ॥१४.१४॥

पदार्थ : वह [अतिथि] (अन्नादेन)जीवनरक्षक (स्वधाकारेण) अपने धारणसामर्थ्य से (अन्नम्) जीवन की (अत्ति) रक्षाकरता है, (यः) जो (एवम्) व्यापक परमात्मा को (वेद) जानता है ॥१४॥"

भावार्थ :