Atharvaveda / 15 / 14 / 15
सयन्म॑नु॒ष्या॒ननु॒ व्यच॑लद॒ग्निर्भू॒त्वानु॒व्य᳡चलत्स्वाहाका॒रम॑न्ना॒दंकृ॒त्वा ॥15॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 14 | Paryay : | Mantra No : 15
In English:
Seer : atharvaa | Devta : adhyaatma athavaa vraaty | Metre : yavamadhyaa tripadaa gaayatrii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : sayanmanuShyaananu vyachaladagnirbhuutvaanuvya᳡chalatsvaahaakaaramannaada.mkRRitvaa .15.
Component Words : saH . yat . manuShyaa᳡n . anu . vi.aachalat . agniH . bhuutvaa . anu.avya᳡chalat . svaahaa.akaaram . anna.aadam . kRRitvaa . .14.15.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : आर्ची पङ्क्ति | स्वर :
विषय : अतिथिके उपकार का उपदेश।
पदपाठ : स: । यत् । म॒नु॒ष्या᳡न् । अनु॑ । वि॒ऽअच॑लत् । अ॒ग्नि: । भू॒त्वा । अ॒नु॒ऽव्य᳡चलत् । स्वा॒हा॒ऽका॒रम् । अ॒न्न॒ऽअ॒दम् । कृ॒त्वा । ॥१४.१५॥
पदार्थ : (सः) वह [व्रात्यअतिथि] (यत्) जब (मनुष्यान् अनु) मनुष्यों [मननशील पुरुषों] की ओर (व्यचलत्)विचरा, वह (अग्निः) अग्नि [समान तेजस्वी] (भूत्वा) होकर और (स्वाहाकारम्)वेदविद्या प्रचार को (अन्नादम्) जीवनरक्षक (कृत्वा) करके (अनुव्यचलत्) लगातारचला गया ॥१५॥"
भावार्थ : टिप्पणी :१५, १६−(मनुष्यान्)मननशीलान् पुरुषान् (अग्निः) अग्निवत्तेजस्वी (स्वाहाकारम्) स्वाहा वाङ्नाम-निघ०१।११। वेदविद्याप्रचारम् (स्वाहाकारेण) वेदविद्याप्रचारेण। अन्यत् पूर्ववत्-म०१, २ ॥