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Atharvaveda / 15 / 15 / 6

तस्य॒व्रात्य॑स्य। यो᳡ऽस्य॑ चतु॒र्थः प्रा॒णो वि॒भूर्नामा॒यं स पव॑मानः ॥6॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 15 | Paryay : | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : भुरिक् प्राजापत्या अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : अतिथि के सामर्थ्य का उपदेश।

पदपाठ : तस्य॑ । व्रात्य॑स्य । य: । अ॒स्य॒ । च॒तु॒र्थ: । प्रा॒ण: । वि॒ऽभू: । नाम॑ । अ॒यम् । स: । पव॑मान: ॥१५.६॥

पदार्थ : (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) इस [व्रात्य] का (चतुर्थः) चौथा (प्राणः) प्राण [श्वास] (विभूः) विभू [व्यापक] (नाम) नाम है, (सः) सो (अयं पवमानः) यह पवमान [शोधक वायु] है [अर्थात् वह बताता है कि वायुक्या है और उस का प्रभाव सब जीवों, सब पृथिवी, सूर्य आदि लोकों पर क्या होता है]॥६॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :६−(विभूः) व्यापकः (पवमानः) शोधकवायुविद्या। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥