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Atharvaveda / 15 / 15 / 7

तस्य॒व्रात्य॑स्य। यो᳡ऽस्य॑ पञ्च॒मः प्रा॒णो योनि॒र्नाम॒ ता इ॒मा आपः॑ ॥7॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 15 | Paryay : | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : भुरिक् प्राजापत्या अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : अतिथि के सामर्थ्य का उपदेश।

पदपाठ : तस्य॑ । व्रात्य॑स्य । य: । अ॒स्य॒ । प॒ञ्च॒म: । प्रा॒ण: । योनि॑: । नाम॑ । ता: । इ॒मा: । आप॑: ॥१५.७॥

पदार्थ : (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) इस [व्रात्य] का (पञ्चमः) पाँचवाँ (प्राणः) प्राण [श्वास] (योनिः) योनि [कारण] (नाम) नाम है, (ताः) सो (इमाः आपः) ये जल हैं [अर्थात् वह सिखाता है कि जल क्या है और भूमण्डल, मेघमण्डल, सूर्यमण्डल आदि लोकों से क्या सम्बन्ध रखता है] ॥७॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :७−(योनिः) यु मिश्रणामिश्रणयोः-नि। कारणम् (आपः) जलविद्या। अन्यत् पूर्ववत्स्पष्टं च ॥