Atharvaveda / 15 / 15 / 9
तस्य॒व्रात्य॑स्य। यो᳡ऽस्य॑ सप्त॒मः प्रा॒णोऽप॑रिमितो॒ नाम॒ ता इ॒माः प्र॒जाः ॥9॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 15 | Paryay : | Mantra No : 9
In English:
Seer : atharvaa | Devta : adhyaatma athavaa vraaty | Metre : pa~Nkti | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : tasyavraatyasya. yo᳡.asya saptamaH praaNo.aparimito naama taa imaaH prajaaH .9.
Component Words : tasya . vraatyasya . yaH . asya . saptamaH . praaNaH . apari.amitaH . naama . taaH . imaaH . pra.ajaaH .15.9.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : विराट् गायत्री | स्वर :
विषय : अतिथि के सामर्थ्य का उपदेश।
पदपाठ : तस्य॑ । व्रात्य॑स्य । य: । अ॒स्य॒ । स॒प्त॒म: । प्रा॒ण: । अप॑रिऽमित: । नाम॑ । ता: । इ॒मा: । प्र॒ऽजा: ॥१५.९॥
पदार्थ : (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) उस [व्रात्य] का (सप्तमः) सातवाँ (प्राणः) प्राण [श्वास] (अपरिमितः) अपरिमित [असीम] (नाम) नामहै, (ताः) सो (इमाः प्रजाः) यह प्रजाएँ हैं [अर्थात् वह समझाता है कि परमात्माकी सृष्टि में भूलोक, चन्द्रलोक, सूर्यलोक आदि के मनुष्य, जीव-जन्तुओं कासम्बन्ध आपस में और दूसरे लोकवालों से क्या रहता है] ॥९॥"
भावार्थ : टिप्पणी :९−(अपरिमितः) अगणितः (प्रजाः) सङ्घटनविद्याः। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥