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Atharvaveda / 15 / 15 / 8

तस्य॒व्रात्य॑स्य। यो᳡ऽस्य॑ ष॒ष्ठः प्रा॒णः प्रि॒यो नाम॒ त इ॒मे प॒शवः॑ ॥8॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 15 | Paryay : | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : भुरिक् प्राजापत्या अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : अतिथि के सामर्थ्य का उपदेश।

पदपाठ : तस्य॑ । व्रात्य॑स्य । य: । अ॒स्य॒ । ष॒ष्ठ:। प्रा॒ण: । प्रि॒य: । नाम॑ । ते । इ॒मे । प॒शव॑: ॥१५.८॥

पदार्थ : (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) इस [व्रात्य] का (षष्ठः) छठा (प्राणः) प्राण [श्वास] (प्रियः) [प्रीतिकारक] (नाम) नाम है, (ते)सो (इमे पशवः) ये पशु हैं [अर्थात् वह जताता है कि गौ अश्व आदि जीव पृथिवीलोकऔर दूसरे लोकों में कैसे उपकारी होते हैं] ॥८॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :८−(प्रियः) प्रीतिकरः (पशवः) गवाश्वादयः। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥