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Atharvaveda / 16 / 8 / 31

तस्मा॑द॒मुंनिर्भ॑जामो॒ऽमुमा॑मुष्याय॒णम॒मुष्याः॑ पु॒त्रम॒सौ यः ॥31॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 16 | Sukta : 8 | Paryay : | Mantra No : 31

In Hindi:

ऋषि : यम | देवता : दुःस्वप्ननासन | छन्द : त्रिपदा निचृत गायत्री | स्वर :

विषय : शत्रु के नाश करने का उपदेश।

पदपाठ : तस्मा॑त् । अ॒मुम् । नि: । भ॒जा॒म॒: । अ॒मुम् । आ॒मु॒ष्या॒य॒णम् । अ॒मुष्या॑: । पु॒त्रम् । अ॒सौ । य: ॥८.३१॥

पदार्थ : (तस्मात्) उस [पद] से (अमुम्) अमुक (अमुम्) अमुक पुरुष (आमुष्यायणम्) अमुक पुरुष के सन्तान, (अमुष्याः) अमुक स्त्री के (पुत्रम्) पुत्र को (निः भजामः) हम भागरहित करतेहैं, (असौ यः) वह जो [कुमार्गी] है ॥३१॥"

भावार्थ :