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Atharvaveda / 17 / 1 / 23

अ॑स्तंय॒ते नमो॑ऽस्तमेष्य॒ते नमो॑ऽस्तमिताय॒ नमः॑। वि॒राजे॒ नमः॑ स्व॒राजे॒ नमः॑ स॒म्राजे॒नमः॑ ॥23॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 17 | Sukta : 1 | Paryay : | Mantra No : 23

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : आदित्य | छन्द : त्रिपदा निचृत बृहती | स्वर :

विषय : आयु की बढ़ती के लिये उपदेश।

पदपाठ : अ॒स्त॒म्ऽय॒ते । नम॑: । अ॒स्त॒म्ऽए॒ष्य॒ते । नम॑: । अस्त॑म्ऽइताय । नम॑: । वि॒ऽराजे॑ । नम॑: । स्व॒ऽराजे॑ । नम॑:। स॒म्ऽराजे॑ । नम॑: ॥१.२३॥

पदार्थ : (अस्तंयते) अस्त होतेहुए [परमेश्वर] को (नमः) नमस्कार है, (अस्तमेष्यते) अस्त होना चाहनेवाले को (नमः) नमस्कार है, (अस्तमिताय) अस्त हो चुके हुए को (नमः) नमस्कार है। (विराजे)विविध राजा को (नमः) नमस्कार है, (स्वराजे) अपने आप राजा को (नमः) नमस्कार है, (सम्राजे) सम्राट् [राजराजेश्वर] को (नमः) नमस्कार है ॥२३॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :२३−(अस्तंयते) अस्तंगच्छते परमेश्वराय (नमः) नमस्कारः (अस्तमेष्यते)अस्तं गमिष्यते (अस्तमिताय) अस्तं प्राप्ताय। अन्यत् पूर्ववत्-म० २˜२॥