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Atharvaveda / 19 / 23 / 16

ए॑कोनविंश॒तिः स्वाहा॑ ॥ 16॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 19 | Sukta : 23 | Paryay : | Mantra No : 16

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : मन्त्रोक्ताः | छन्द : प्राजापत्या गायत्री | स्वर :

विषय : ब्रह्मविद्या का उपदेश।

पदपाठ : ए॒को॒ना॒विं॒श॒तिः। स्वाहा॑ ॥२३.१६॥

पदार्थ : (एकोनविंशतिः) उन्नीस [ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, चार वर्ण, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास, चार आश्रम−सत्सङ्ग, सुनना, विचारना, ध्यान करना, चार कर्म−अप्राप्त की इच्छा, प्राप्त की रक्षा, रक्षित का बढ़ाना, बढ़े हुए का सन्मार्ग में व्यय करना चार पुरुषार्थ−मन, बुद्धि और अहङ्कार इन उन्नीस स्तुतियोग्य विद्याओं के लिये] (स्वाहा) स्वाहा [सुन्दर वाणी] हो ॥१६॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१६−(एकोनविंशतिः) सुपां सुलुक्०। पा०७।१।३९। चतुर्थीस्थाने प्रथमा विशेषणपदलोपश्च। एकोनविंशतये ऋग्भ्यः। चत्वारो वर्णाश्चत्वार आश्रमाः सत्सङ्गश्रवणमनननिदिध्यासनानि चत्वारि कर्माणि, अलब्धस्य लिप्सा लब्धस्य रक्षणं रक्षितस्य वृद्धिर्वृद्धस्य सन्मार्गे व्ययकरणम्, मनोबुद्ध्यहंकाराश्चेत्यूनविंशतिर्विद्यास्ताभ्यः ॥