Atharvaveda / 20 / 20 / 5
इन्द्रो॑ अ॒ङ्गं म॒हद्भ॒यम॒भी षदप॑ चुच्यवत्। स हि स्थि॒रो विच॑र्षणिः ॥ 5॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 20 | Paryay : | Mantra No : 5
In English:
Seer : gRRitsamadaH | Devta : indraH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : indro a~Nga.m mahadbhayamabhii Shadapa chuchyavat. sa hi sthiro vicharShaNiH . 5.
Component Words : indraH . a~Nga . mahat . bhavam . abhi . sat . apa . chuchyavat . saH . hi . sthiraH . vi.acharShaNi .20.5.
In Hindi:
ऋषि : गृत्समदः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर :
विषय : राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।
पदपाठ : इन्द्र॑: । अ॒ङ्ग । म॒हत् । भ॒वम् । अ॒भि । सत् । अप॑ । चु॒च्य॒व॒त् ॥ स: । हि । स्थि॒र: । विऽच॑र्षणि ॥२०.५॥
पदार्थ : (अङ्ग) हे विद्वान् ! (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले राजा] ने (महत्) बड़े और (अभि) सब ओर से (सत्) वर्तमान (भयम्) भय को (अप चुच्यवत्) हटा दिया है। (सः हि) वही (स्थिर) दृढ़ और (विचर्षणिः) विशेष देखनेवाला है ॥॥"
भावार्थ : टिप्पणी :मन्त्र -७ ऋग्वेद में है-२।४१।१०-१२ और मन्त्र सामवेद में हैं-पू० ३।१।७ ॥ −(इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् राजा (अङ्ग) सम्बोधने (महत्) अधिकम् (अभि) सर्वतः (सत्) अस भुवि-शतृ। भवत्। वर्तमानम् (अप) दूरे (चुच्यवत्) च्युङ् गतौ-लुङि णिलोपे, उपधाह्रस्वत्वम्, अडभावः। अपसारितवान् (सः) (हि) एव (स्थिरः) दृढः (विचर्षणिः) विशेषेण द्रष्टा-निघ० ३।११ ॥