Atharvaveda / 20 / 47 / 11
यु॒ञ्जन्त्य॑स्य॒ काम्या॒ हरी॒ विप॑क्षसा॒ रथे॑। शोणा॑ धृ॒ष्णू नृ॒वाह॑सा ॥ 11॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 47 | Paryay : | Mantra No : 11
In English:
Seer : madhuchChandaaH | Devta : indraH | Metre : aastaarapa~NktiH | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : yu~njantyasya kaamyaa harii vipakShasaa rathe. shoNaa dhRRiShNuu nRRivaahasaa . 11.
Component Words : yu~njanti . asya . kaamyaa . harii iti . vi.apakShasaa . rathe . shoNaa . dhRRiShNuu iti . nRRi.avaahasaa .47.11.
In Hindi:
ऋषि : मधुच्छन्दाः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर :
विषय : १०-१२-परमेश्वर के गुणों का उपदेश।
पदपाठ : यु॒ञ्जन्ति॑ । अ॒स्य॒ । काम्या॑ । हरी॒ इति॑ । विऽप॑क्षसा । रथे॑ ॥ शोणा । धृ॒ष्णू इति॑ । नृ॒ऽवाह॑सा ॥४७.११॥
पदार्थ : (अस्य) इस [परमात्मा-मन्त्र १०] के (काम्या) चाहने योग्य, (विपक्षसा) विविध प्रकार ग्रहण करनेवाले, (शोणा) व्यापक (धृष्णू) निर्भय, (नृवाहसा) नेताओं [दूसरों के चलानेवाले सूर्य आदि लोकों] के चलानेवाले (हरी) दोनों धारण-आकर्षण गुणों को (रथे) रमणीय जगत् के बीच (युञ्जन्ति) वे [प्रकाशमान पदार्थ-मन्त्र १०] ध्यान में रखते हैं ॥११॥"
भावार्थ : टिप्पणी :१०-१२−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अ० २०।२६।४-६ ॥