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Atharvaveda / 20 / 47 / 12

के॒तुं कृ॒ण्वन्न॑के॒तवे॒ पेशो॑ मर्या अपे॒शसे॑। समु॒षद्भि॑रजायथाः ॥ 12॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 47 | Paryay : | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : मधुच्छन्दाः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर :

विषय : १०-१२-परमेश्वर के गुणों का उपदेश।

पदपाठ : के॒तुम् । कृ॒ण्वन् । अ॒के॒तवे॑ । पेश॑: । म॒र्या॒: । अ॒पे॒शसे॑ । सम् । उ॒षत्ऽभि॑: । अ॒जा॒य॒था॒: ॥४७.१२॥

पदार्थ : (मर्याः) हे मनुष्यो ! (अकेतवे) अज्ञान हटाने के लिये (केतुम्) ज्ञान को और (अपेशसे) निर्धनता मिटाने के लिये (पेशः) सुवर्ण आदि धन को (कृण्वन्) उत्पन्न करता हुआ वह [परमात्मा-मन्त्र १०, ११] (उषद्भिः) प्रकाशमान गुणों के साथ (सम्) अच्छे प्रकार (अजायथाः) प्रकट हुआ है ॥१२॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१०-१२−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अ० २०।२६।४-६ ॥