Rigveda / 1 / 91 / 22
त्वमि॒मा ओष॑धीः सोम॒ विश्वा॒स्त्वम॒पो अ॑जनय॒स्त्वं गाः। त्वमा त॑तन्थो॒र्व१॒॑न्तरि॑क्षं॒ त्वं ज्योति॑षा॒ वि तमो॑ ववर्थ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 91 | Mantra No : 22
In English:
Seer : gotamo raahuugaNaH | Devta : somaH | Metre : viraaTpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : tvamimaa oShadhiiH soma vishvaastvamapo ajanayastva.m gaaH. tvamaa tatanthorva1ntarikSha.m tva.m jyotiShaa vi tamo vavartha .
Component Words : tvam. imaaH. oShadhiiH. soma. vishvaaH. tvam. apaH. ajanayaH. tvam. gaaH. tvam. aa. tatantha. uru. antarikSham. tvam. jyotiShaa. vi. tamaH. vavartha . 1.91.22
In Hindi:
ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : सोमः | छन्द : विराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।
पदपाठ : त्वम्। इ॒माः। ओष॑धीः। सो॒म॒। विश्वाः॒। त्वम्। अ॒पः। अ॒ज॒न॒यः॒। त्वम्। गाः। त्वम्। आ। त॒त॒न्थ॒। उ॒रु। अ॒न्तरि॑क्षम्। त्वम्। ज्योति॑षा। वि। तमः॑। व॒व॒र्थ॒ ॥ १.९१.२२
पदार्थ : हे (सोम) समस्त गुणयुक्त आरोग्यपन और बल देनेवाले ईश्वर ! जिस कारण (त्वम्) आप (इमाः) प्रत्यक्ष (विश्वाः) समस्त (ओषधीः) रोगों का विनाश करनेवाली सोमलता आदि ओषधियों को (अजनयः) उत्पन्न करते हो (त्वम्) आप (अपः) जलों (त्वम्) आप (गाः) इन्द्रियों और किरणों को प्रकाशित करते हो (त्वम्) आप (ज्योतिषा) विद्या और श्रेष्ठशिक्षा के प्रकाश से (अन्तरिक्षम्) आकाश को (उरु) बहुत (आ) अच्छी प्रकार (ततन्थ) विस्तृत करते हो और (त्वम्) आप उक्त विद्या आदि गुणों से (तमः) अविद्या, निन्दित शिक्षा वा अन्धकार को (वि ववर्थ) स्वीकार नहीं करते, इससे आप सब लोगों से सेवा करने योग्य हैं ॥ २२ ॥
भावार्थ : जिस ईश्वर ने नाना प्रकार की सृष्टि बनाई है, वही सब मनुष्यों को उपासना के योग्य इष्टदेव हैं ॥ २२ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : सोमः | छन्द : विराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते ।
पदपाठ : त्वम्। इ॒माः। ओष॑धीः। सो॒म॒। विश्वाः॒। त्वम्। अ॒पः। अ॒ज॒न॒यः॒। त्वम्। गाः। त्वम्। आ। त॒त॒न्थ॒। उ॒रु। अ॒न्तरि॑क्षम्। त्वम्। ज्योति॑षा। वि। तमः॑। व॒व॒र्थ॒ ॥ १.९१.२२
पदार्थ : (त्वम्) जगदीश्वरः (इमाः) प्रत्यक्षीभूताः (ओषधीः) सर्वरोगनाशिकाः सोमाद्योषधीः (सोम) सोम्यगुणसम्पन्न आरोग्यबलप्रापक (विश्वाः) अखिलाः (त्वम्) (अपः) बलानि जलानि वा (अजनयः) जनयसि। अत्र लडर्थे लङ्। (त्वम्) अयं वा (गाः) इन्द्रियाणि किरणान्वा (त्वम्) (आ) (ततन्थ) विस्तृणोषि। अत्र बभूथाततन्थजगृभ्मववर्थेति निगमे। अ० ७। २। ६४। अनेन सूत्रेणाततन्थ, ववर्थेत्येतौ निपात्येते। (उरु) बहु (अन्तरिक्षम्) आकाशम् (त्वम्) (ज्योतिषा) विद्यासुशिक्षाप्रकाशेन शीतलेन तेजसा वा (हि) विगतार्थे (तमः) अविद्याकुत्सिताख्यं चक्षुदृष्ट्यावरकं वाऽन्धकारम् (ववर्थ) वृणोषि। अत्राऽपि वर्त्तमाने लिट् ॥ २२ ॥
अन्वय : हे सोमेश्वर यतस्त्वं चेमा विश्वा ओषधीरजनयस्त्वमपस्त्वं गाश्चाजनयस्त्वं ज्योतिषाऽन्तरिक्षमुर्वाततन्थ त्वं ज्योतिषा तमो वि ववर्थ तस्माद्भवानस्माभिः सर्वैः सेव्यः ॥ २२ ॥
भावार्थ : येनेश्वरेण विविधा सृष्टिरुत्पादिता स एव सर्वेषामुपास्य इष्टदेवोऽस्ति ॥ २२ ॥