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Rigveda / 1 / 91 / 23

दे॒वेन॑ नो॒ मन॑सा देव सोम रा॒यो भा॒गं स॑हसावन्न॒भि यु॑ध्य। मा त्वा त॑न॒दीशि॑षे वी॒र्य॑स्यो॒भये॑भ्य॒: प्र चि॑कित्सा॒ गवि॑ष्टौ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 91 | Mantra No : 23

In Hindi:

ऋषि : गोतमो राहूगणः | देवता : सोमः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

पदपाठ : दे॒वेन॑। नः॒। मन॑सा। दे॒व॒। सो॒म॒। रा॒यः। भा॒गम्। स॒ह॒सा॒ऽव॒न्। अ॒भि। यु॒ध्य॒। मा। त्वा। त॒न॒त्। ईशि॑षे। वी॒र्य॑स्य। उ॒भये॑भ्यः। प्र। चि॒कि॒त्स॒। गोऽइ॑ष्टौ ॥ १.९१.२३

पदार्थ : हे (सहसावन्) अत्यन्त बलवान् (देव) दिव्यगुणसम्पन्न (सोम) सर्व विद्या और सेना के अध्यक्ष ! आप (देवेन) दिव्यगुणयुक्त (मनसा) विचार से (रायः) राज्यधन के लाभ को (अभि) शत्रुओं के सम्मुख (युध्य) युद्ध कीजिये जो आप (नः) हमारे लिये धन के (भागम्) भाग के (ईशिषे) स्वामी हो उस (त्वा) तुझको (गविष्टौ) इन्द्रिय और भूमि के राज्य के प्रकाशों की सङ्गतियों में शत्रु (मा तनत्) पीड़ायुक्त न करें। आप (वीर्यस्य) पराक्रम को (उभयेभ्यः) अपने और पराये योद्धाओं से (मा प्रचिकित्स) संशययुक्त मत हो ॥ २३ ॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि परम उत्तम सेनाध्यक्ष और ओषधिगण का आश्रय और युद्ध में प्रवृत्ति कर उत्साह के साथ अपनी सेना को जोड़ और शत्रुओं की सेना का पराजय कर चक्रवर्त्ति राज्य के ऐश्वर्य को प्राप्त हों ॥ २३ ॥इस सूक्त में पढ़ने-पढ़ानेवालों आदि की विद्या के पढ़ने आदि कामों की सिद्धि करनेवाले (सोम) शब्द के अर्थ के कथन से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह ९१ इक्कानवाँ सूक्त और वर्ग २३ तेईस समाप्त हुआ ॥