Rigveda / 1 / 121 / 9
त्वमा॑य॒सं प्रति॑ वर्तयो॒ गोर्दि॒वो अश्मा॑न॒मुप॑नीत॒मृभ्वा॑। कुत्सा॑य॒ यत्र॑ पुरुहूत व॒न्वञ्छुष्ण॑मन॒न्तैः प॑रि॒यासि॑ व॒धैः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 121 | Mantra No : 9
In English:
Seer : aushijo dairghatamasaH kakShiivaan | Devta : vishve devaa indrashch | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : tvamaayasa.m prati vartayo gordivo ashmaanamupaniitamRRibhvaa. kutsaaya yatra puruhuuta vanva~nChuShNamanantaiH pariyaasi vadhaiH .
Component Words : tvam. aayasam. prati. vartayaH. goH. divaH. ashmaanam. upa.aniitam. RRIbhvaa. kutsaaya. yatra. puru.ahuuta. vanvan. shuShNam. anantaiH. pari.ayaasi. vadhaiH . 1.121.9
In Hindi:
ऋषि : औशिजो दैर्घतमसः कक्षीवान् | देवता : विश्वे देवा इन्द्रश्च | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।
पदपाठ : त्वम्। आ॒य॒सम्। प्रति॑। व॒र्त॒यः॒। गोः। दि॒वः। अश्मा॑नम्। उप॑ऽनीतम्। ऋभ्वा॑। कुत्सा॑य। यत्र॑। पु॒रु॒ऽहू॒त॒। व॒न्वन्। शुष्ण॑म्। अ॒न॒न्तैः। प॒रि॒ऽयासि॑। व॒धैः ॥ १.१२१.९
पदार्थ : हे (वन्वन्) अच्छे प्रकार सेवन करते और (पुरुहूत) बहुत मनुष्यों से ईर्ष्या के साथ बुलाये हुए मनुष्य ! (त्वम्) तू जैसे सूर्य (दिवः) दिव्य सुख देनेहारे प्रकाश से अन्धकार को दूर करके (अश्मानम्) व्याप्त होनेवाले (उपनीतम्) अपने समीप आये हुए मेघ को छिन्न-भिन्नकर संसार में पहुँचाता है, वैसे (ऋभ्वा) मेधावी अर्थात् धीरबुद्धि वाले पुरुष के साथ (आयसम्) लोहे से बनाये हुए शस्त्र-अस्त्रों को लेके (कुत्साय) वज्र के लिये (शुष्णम्) शत्रुओं के पराक्रम को सुखानेहारे बल को धारण करता हुआ (यत्र) जहाँ गौओं के मारनेवाले हैं, वहाँ उनको (अनन्तैः) जिनकी संख्या नहीं उन (वधैः) गोहिंसकों को मारने के उपायों से (परियासि) सब ओर से प्राप्त होते हो, उनको (गोः) गौ आदि पशुओं के समीप से (प्रति, वर्त्तयः) लौटाओ भी ॥ ९ ॥
भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! तुम लोग जैसे सूर्य मेघ की वर्षा और अन्धकार को दूर कर सबको हर्ष आनन्दयुक्त करता है, वैसे गौ आदि पशुओं की रक्षा कर उनके मारनेवालों को रोक निरन्तर सुखी होओ। यह काम बुद्धिमानों के सहाय के विना होने को संभव नहीं है, इससे बुद्धिमानों के सहाय से ही उक्त काम का आचरण करो ॥ ९ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : औशिजो दैर्घतमसः कक्षीवान् | देवता : विश्वे देवा इन्द्रश्च | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ।
पदपाठ : त्वम्। आ॒य॒सम्। प्रति॑। व॒र्त॒यः॒। गोः। दि॒वः। अश्मा॑नम्। उप॑ऽनीतम्। ऋभ्वा॑। कुत्सा॑य। यत्र॑। पु॒रु॒ऽहू॒त॒। व॒न्वन्। शुष्ण॑म्। अ॒न॒न्तैः। प॒रि॒ऽयासि॑। व॒धैः ॥ १.१२१.९
पदार्थ : (त्वम्) प्रजापालकः (आयसम्) अयोनिर्मितं शस्त्रास्त्रादिकम् (प्रति) (वर्त्तयः) (गोः) गवादेः पशोः (दिवः) दिव्यसुखप्रदात् प्रकाशात् (अश्मानम्) व्यापनशीलं मेघम्। अश्मेति मेघना०। निघं० १। १०। (उपनीतम्) प्राप्तसमीपम् (ऋभ्वा) मेधाविना (कुत्साय) वज्राय (यत्र) स्थले (पुरुहूत) बहुभिः स्पर्द्धित (वन्वन्) संभजमान (शुष्णम्) शोषकं बलम् (अनन्तैः) अविद्यमानसीमभिः (परियासि) सर्वतो याहि (वधैः) गोहिंस्राणां मारणोपायैः ॥ ९ ॥
अन्वय : हे वन्वन् पुरुहूत त्वं सूर्यो दिवस्तमो हत्वाऽश्मानमुपनीतं प्रापयतीव ऋभ्वा सहायसं गृहीत्वा कुत्साय शुष्णं चादधन् यत्र गोहिंसका वर्त्तन्ते तत्र तेषामनन्तैर्वधैः परियासि तान् गोः सकाशात्प्रति वर्त्तयश्च ॥ ९ ॥
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्या यूयं यथा सविता मेघं वर्षयित्वाऽन्धकारं निवर्त्य सर्वमाह्लादयति तथा गवादीनां रक्षणं विधायैतद्धिंसकान् प्रतिरोध्य सततं सुखयत नह्येतत्कर्म बुद्धिमत्सहायमन्तरा संभवति तस्माद्धीमतां सहायेनैव तदाचरत ॥ ९ ॥