Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 121 / 10

पु॒रा यत्सूर॒स्तम॑सो॒ अपी॑ते॒स्तम॑द्रिवः फलि॒गं हे॒तिम॑स्य। शुष्ण॑स्य चि॒त्परि॑हितं॒ यदोजो॑ दि॒वस्परि॒ सुग्र॑थितं॒ तदाद॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 121 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : औशिजो दैर्घतमसः कक्षीवान् | देवता : विश्वे देवा इन्द्रश्च | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : पु॒रा। यत्। सूरः॑। तम॑सः। अपि॑ऽइतेः। तम्। अ॒द्रि॒ऽवः॒। फ॒लि॒ऽगम्। हे॒तिम्। अ॒स्य॒। शुष्ण॑स्य। चि॒त्। परि॑ऽहितम्। यत्। ओजः॑। दि॒वः। परि॑। सुऽग्र॑थितम्। तत्। आ। अ॒द॒रित्य॑दः ॥ १.१२१.१०

पदार्थ : (अद्रिवः) जिनके राज्य में प्रशंसित पर्वत विद्यमान हैं, वैसे विख्यात हे राजन् ! आप जैसे (सूरः) सूर्य (फलिगम्) मेघ छिन्न-भिन्न कर (तमसः) अन्धकार के (अपीतेः) विनाश करनेहारे (दिवः) प्रकाश से प्रकाशित होता है, वैसे अपनी सेना से (तम्) उस शत्रुबल को (आ, अदः) विदारो अर्थात् उसका विनाश करो, (यत्) जिसको (पुरा) पहिले निवृत्त करते रहे हो, उसको (सुग्रथितम्) अच्छा बाँधकर ठहराओ, (यत्) जो (अस्य) इसका (परिहितम्) सब ओर से सुख देनेवाला (ओजः) बल है (तत्) उसको निवृत्त कर (शुष्णस्य) सुखानेवाले शत्रु के (परि) सब ओर से (चित्) भी (हेतिम्) वज्र को उसके हाथ से गिरा देओ, जिससे यह गौओं का मारनेवाला न हो ॥ १० ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। हे राजपुरुषो ! जैसे सूर्य मेघ को मार और उसको भूमि में गिराय सब प्राणियों को प्रसन्न करता है, वैसे ही गौओं के मारनेवालों को मार गौ आदि पशुओं को निरन्तर सुखी करो ॥ १० ॥