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Rigveda / 1 / 131 / 2

विश्वे॑षु॒ हि त्वा॒ सव॑नेषु तु॒ञ्जते॑ समा॒नमेकं॒ वृष॑मण्यव॒: पृथ॒क्स्व॑: सनि॒ष्यव॒: पृथ॑क्। तं त्वा॒ नावं॒ न प॒र्षणिं॑ शू॒षस्य॑ धु॒रि धी॑महि। इन्द्रं॒ न य॒ज्ञैश्चि॒तय॑न्त आ॒यव॒: स्तोमे॑भि॒रिन्द्र॑मा॒यव॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 131 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : परुच्छेपो दैवोदासिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदत्यष्टिः | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर मनुष्यों को परमात्मा की ही उपासना करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : विश्वे॑षु। हि। त्वा॒। सव॑नेषु। तु॒ञ्जते॑। स॒मा॒नम्। एक॑म्। वृष॑ऽमन्यवः। पृथ॑क्। स्व१॒॑रिति॑ स्वः॑। स॒नि॒ष्यवः॑। पृथ॑क्। तम्। त्वा॒। नाव॑म्। न। प॒र्षणि॑म्। शू॒षस्य॑। धु॒रि। धी॒म॒हि॒। इन्द्र॑म्। न। य॒ज्ञैः। चि॒तय॑न्तः। आ॒यवः॑। स्तोमे॑भिः। इन्द्र॑म्। आ॒यवः॑ ॥ १.१३१.२

पदार्थ : हे परमेश्वर ! (पृथक् पृथक्) अलग-अलग (सनिष्यवः) उत्तमता से सेवनवाले (वृषमण्यवः) जिनका बैल के क्रोध के समान क्रोध वे हम लोग जिन (समानम्) सर्वत्र एकरस व्याप्त (एकम्) जिसका दूसरा कोई सहायक नहीं उन (स्वः) सुखस्वरूप (त्वा) आपको (विश्वेषु) समग्र (सवनेषु) ऐश्वर्य आदि पदार्थों में विद्वान् लोग जैसे (तुञ्जते) राखते अर्थात् मानते-जानते हैं, वैसे (हि) ही (तम्) उन (त्वा) आपको (शूषस्य) बलवान् पुरुष के (धुरि) धारण करनेवाले काठ पर (पर्षणिम्) सींचने योग्य (नावम्) नाव के (न) समान (धीमहि) धारण करें वा (इन्द्रम्) परम ऐश्वर्य करानेवाले सूर्यमण्डल को जैसे उसके (आयवः) चारों ओर घूमते हुए लोक वैसे वा जैसे (यज्ञैः) विद्वानों के सङ्ग और सेवनों से (इन्द्रम्) परमऐश्वर्य को (न) वैसे (चितयन्तः) अच्छे प्रकार चिन्तन करते हुए (आयवः) पुरुषार्थ को प्राप्त होनेवाले हम लोग (स्तोमेभिः) स्तुतियों से आपकी प्रशंसा करें ॥ २ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि विद्वान् जन जिस सच्चिदानन्दस्वरूप नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्तस्वभाव, सर्वत्र एकरसव्यापी, सबका आधार, सब ऐश्वर्य देनेवाले एक अद्वैत (कि जिसकी तुल्यता का दूसरा नहीं) परमात्मा की उपासना करते, वही निरन्तर सबको उपासना करने योग्य है ॥ २ ॥