Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 131 / 3

वि त्वा॑ ततस्रे मिथु॒ना अ॑व॒स्यवो॑ व्र॒जस्य॑ सा॒ता गव्य॑स्य नि॒:सृज॒: सक्ष॑न्त इन्द्र नि॒:सृज॑:। यद्ग॒व्यन्ता॒ द्वा जना॒ स्व१॒॑र्यन्ता॑ स॒मूह॑सि। आ॒विष्करि॑क्र॒द्वृष॑णं सचा॒भुवं॒ वज्र॑मिन्द्र सचा॒भुव॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 131 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : परुच्छेपो दैवोदासिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिगष्टिः | स्वर : मध्यमः

विषय : फिर सबको किसकी उपासना करनी चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : वि। त्वा॒। त॒त॒स्रे॒। मि॒थु॒नाः। अ॒व॒स्यवः॑। व्र॒जस्य॑। सा॒ता। गव्य॑स्य। निः॒ऽसृजः॑। सक्ष॑न्तः। इ॒न्द्र॒। निः॒ऽसृजः॑। यत्। ग॒व्यन्ता॑। द्वा। जना॑। स्वः॑। यन्ता॑। स॒म्ऽऊह॑सि। आ॒विः। करि॑क्रत्। वृष॑णम्। स॒चा॒ऽभुवम्। वज्र॑म्। इ॒न्द्र॒। स॒चा॒ऽभुव॑म् ॥ १.१३१.३

पदार्थ : हे (इन्द्र) परमेश्वर्य्य के देनेहारे जगदीश्वर ! (सक्षन्तः) सहते हुए (निःसृजः) निरन्तर अनेकानेक व्यवहारों को उत्पन्न करने (अवस्यवः) और अपनी रक्षा चाहनेवाले (निःसृजः) अतीव सम्पन्न (मिथुना) स्त्री और पुरुष दो दो जने (त्वा) आपको प्राप्त होके (व्रजस्य) जाने योग्य (गव्यस्य) गौओं के लिये हित करनेवाले अर्थात् जिसमें आराम पाने को गौएँ जातीं उस गोड़ा आदि स्थान के (साता) सेवन में जैसे दुःख छुटें वैसे दुःखों को (विततस्रे) छोड़ते हैं। हे (इन्द्र) दुःखों का विनाश करनेवाले (यत्) जो (गव्यन्ता) गौओं के समान आचरण करते (द्वा) दो (स्वः) सुखस्वरूप आपको (यन्ता) प्राप्त होते हुए (जना) स्त्री-पुरुषों को (आविष्करिकत्) प्रकट करते हुए आप (समूहसि) उनको अच्छे प्रकार चेतना देते हो, उन (सचाभुवम्) समवाय सम्बन्ध में प्रसिद्ध होते हुए (वज्रम्) दुष्टों को वज्र के समान दण्ड देने (वृषणम्) सबको सींचने (सचाभुवम्) और सत्य की भावना करानेवाले आपकी वे दोनों नित्य उपासना करें ॥ ३ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो पुरुष और स्त्री सब जगत् को प्रकाशित करने, उत्पन्न करने, धारण करने और देनेवाले सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर ही का सेवन करते हैं, वे निरन्तर सुखी होते हैं ॥ ३ ॥