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Rigveda / 8 / 1 / 6

वस्याँ॑ इन्द्रासि मे पि॒तुरु॒त भ्रातु॒रभु॑ञ्जतः । मा॒ता च॑ मे छदयथः स॒मा व॑सो वसुत्व॒नाय॒ राध॑से ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 1 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : मेधातिथिमेध्यातिथी काण्वौ | देवता : इन्द्र: | छन्द : आर्षीबृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : अब पिता आदिकों से भी परमात्मा को उत्कृष्ट कथन करते हैं।

पदपाठ : वस्या॑न् । इ॒न्द्र॒ । अ॒सि॒ । मे॒ । पि॒तुः॒ । उ॒त । भ्रातुः॑ । अभु॑ञ्जतः । मा॒ता । च॒ । मे॒ । छ॒द॒य॒थः॒ । स॒मा । व॒सो॒ इति॑ । व॒सु॒ऽत्व॒नाय॑ । राध॑से ॥ ८.१.६

पदार्थ : (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (अभुञ्जतः) अपालक (पितुः) पिता (उत) और (भ्रातुः) भ्राता से (वस्यान्, असि) आप अधिक पालक हैं, (वसो) हे व्यापक परमात्मन् ! आप (च) और (मे) मेरी (माता) माता दोनों ही (वसुत्वनाय) मेरी व्याप्ति के लिये तथा (राधसे) ऐश्वर्य्य के लिये (समा) समान (छदयथः) पूजित बनाते हैं ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र का भाव यह है कि जिस प्रकार माता हार्दिक प्रेम से पुत्र का लालन-पालन करके सदा उसकी भलाई चाहती है, इसी प्रकार ईश्वर भी मातृवत् सब जीवों की हितकामना करता है । मन्त्र में पिता तथा भ्राता सब सम्बन्धियों का उपलक्षण है अर्थात् ईश्वर सब सम्बन्धियों से बड़ा है और माता के समान कथन करने से इस बात को दर्शाया है कि अन्य सम्बन्धियों की अपेक्षा माता अधिक स्नेह करती है और माता के समान ही परमात्मा सब मनुष्यों का शुभचिन्तक है ॥६ ॥